यज्ञ और हवन सनातन धर्म (हिन्दू) परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। सनातन परंपरा के अनुयायी मूल रूप से अग्नि के उपासक रहे हैं। वेदों में ऋग्वेद का प्रथम शब्द ही अग्नि है ‘अ॒ग्निमी॑ळे पु॒रोहि॑तं य॒ज्ञस्य॑ दे॒वमृ॒त्विज॑म्। होता॑रं रत्न॒धात॑मम्।’ इसका अर्थ यह हुआ कि यज्ञ अग्नि-विज्ञान से जुड़ा है।
शास्त्रों के अनुसार अग्नि पूजा का दर्शन है। प्रकृति और देवी देवताओं के प्रति जो हमारा दायित्व है, उसका निर्वहन आवश्यक है। यज्ञ, हवन, अग्निहोत्र का लौकिक मुख्य उद्देश्य वातावरण को शुद्ध करना है। यज्ञ के लिए जो अग्निकुंड तैयार किए जाते हैं, वे शुद्ध विज्ञान अर्थात् गणित व रेखागणित के आधार पर निर्मित किये जाते हैं।
इसके अतिरिक्त यज्ञ में डाली जाने वाली सामग्री जैसे अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियाँ, तिल, जौ, चावल, गुग्गल और गाय का शुद्ध घी आदि का भी वैज्ञानिक ढंग से चयन होता था। ये सभी पदार्थ जब अग्नि में स्वाहा होते हैं तो सूक्ष्म और विस्तारित होकर वायुमंडल में विलीन हो जाते हैं। अग्नि में डालने से पूर्व मंत्रोच्चारण होता है जो उन पदार्थों को परिलक्षित कर देता है अर्थात् अग्नि में डाले जानेवाले पदार्थ को सूक्ष्म रूप से किस दैवीय शक्ति को भेजा जा रहा है, वह बोले जाने वाले मंत्र से जाना जाता है। मंत्र के अनुसार अग्नि उस पदार्थ के सूक्ष्म रूप को निहित देव या देवी के पास पहुँचा देती है। हवन की अग्नि जड़ी-बूटियों, मेवा व अन्य पदार्थों की भस्म बना देती है, जो एक सशक्त औषधि बन जाती है, जिसे बाद में प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं में बाँट दिया जाता है।
यज्ञ अथवा हवन की परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है। यज्ञ के बारे में सर्वाधिक यजुर्वेद में बताया गया है। रामायण, महाभारत में हमने अनेक छोटे बड़े यज्ञों के बारे में पढ़ा है, जैसे पुत्रेष्ठि यज्ञ, अश्वमेध यज्ञ और राजसूय यज्ञ आदि।
यज्ञ और हवन में थोड़ा सा अंतर होता है। हवन ‘पंच महायज्ञ’ का ही एक भाग है। हवन अधिकतर अपने स्वयं के अथवा परिवार के दैनंदिन जीवन में आनेवाली समस्याओं के निराकरण, समाधान, आत्मिक उन्नति, शुद्धि, आरोग्य, लंबी उम्र, शांति तथा अपने आसपास के वातावरण के शुद्धिकरण के लिए किया जाता है। हवन हमारे जीवन के अलग-अलग सुअवसरों पर, जैसे विवाह, गृह प्रवेश, भूमि पूजन आदि के समय भी किया जाता है। होम या हवन घर अथवा ऑफिस में भी हो सकता है। हवन कुछ घंटे या एकाध दिन का होता है।
किंतु यज्ञ का स्वरुप व्यापक अथवा बड़ा होता है, यज्ञ कई दिनों तक चलता रहता है। ‘महायज्ञ’ तो कई महीनों तक चलता है। यज्ञ पूरे विश्व ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि, सभी मस्तिष्क और आत्माओं की अलग-अलग प्रचलित ऊर्जाओं के साथ संपर्क स्थापित करने का एक मार्ग या माध्यम है। यज्ञ का लाभ व्यक्तिगत न होकर, पूरे विश्व के लिए है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बात करें तो भौतिक दुनिया में दो प्रकार की ऊर्जा अथवा कार्य शक्ति जिसे अंग्रेजी में एनर्जी कहा जाता है, पाई जाती है। पहली है, ताप या उष्णता और दूसरी है, ध्वनि। इन दोनो ही ऊर्जाओं का उपयोग यज्ञ में किया जाता है। ताप ऊर्जा जहाँ यज्ञ की अग्नि से मिलती है वहीं ध्वनि ऊर्जा मंत्रोच्चारण से निर्माण होती है। संस्कृत के हर मंत्र का हमारे ऋषियों ने इस प्रकार निर्माण किया है कि हर शब्द तथा उस शब्द का विशेष उच्चार से निर्माण होने वाली ध्वनि लहरें ऊर्जा निर्माण करती हैं। इस प्रकार वैदिक मंत्रोच्चार और अग्नि व अग्नि में डाली समिधा के प्रभाव से दोनों ऊर्जाओं के मिश्रण से निर्माण होनेवाली इस ऊर्जा से भौतिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं।
वर्ष 2009 में टाइम्स ऑफ़ इंडिया में एक समाचार छपा था जिसका शीर्षक था,’ हवन फॉर बैक्टीरिया फ्री होम्स: स्टडी। यह अध्ययन राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के वैज्ञानिकों ने अपनी एक रिसर्च में हवन या यज्ञ करने की शास्त्रीय विधि का प्रयोग करके किया था। इस अध्ययन में पाया गया था कि आम की लकड़ी के साथ यदि शुद्ध हवन सामग्री का प्रयोग किया जाए तो एक घंटे के भीतर ही हवन कक्ष में उपस्थित जीवाणु और विषाणु का स्तर 94 प्रतिशत कम हो जाता है। इस वर्ष अर्थात् जनवरी 2022 में टाइम्स ऑफ़ इंडिया में भारत के पतंजलि संस्थान के शोध को लेकर भी समाचार प्रकाशित हुआ है। जिसमें हवन से वातावरण शुद्धिकरण और कीटाणुओं के निदान की बात की गई है।
यज्ञ अथवा हवन को लेकर एक नाम अथवा प्रक्रिया अथवा परंपरा और भी है जो युगों से प्रचलित है उसका नाम है ‘अग्निहोत्र’। चाहे रामायण हो या महाभारत यज्ञ अनुष्ठान अथवा अग्निहोत्र के बारे में प्रचुर मात्रा में लिखा हुआ है। दूसरे शब्दों में लिखा जाए तो भारत में अग्निहोत्र की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। अग्निहोत्र एक प्रकार का यज्ञ ही है। यजुर्वेद (10.8.29) के अनुसार यज्ञ के कारण मानव में स्थित चैतन्य शक्ति को ऊर्जा मिलती है तथा मानव निरोगी रहता है। हमारा जीवन, जीवनशक्ति, आँखें, कान, वाचा, मन तथा आत्मा यज्ञ की वजह से प्रबल बनें।
अग्निहोत्र को लेकर आज दुनियाभर शोध हो रहे हैं और हुए हैं जिनमें इसके वैज्ञानिक तत्व की पुष्टि हुई है। इंटरनेट के इस युग में बहुत सी वेबसाइट अग्निहोत्र की वैज्ञानिकता और महत्व पर लिख रही हैं। अग्निहोत्र संबंधी शोध और अन्य जानकारियां वैसे तो इंटरनेट पर अनेक जगह मिल जायेगी लेकिन www.agnihotra.org पर बहुत सी जानकारी एकसाथ मिल जायेगी।
वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो अग्निहोत्र तांबे (धातु) के एक पात्र में किया जाता है जिसे अग्निपात्र कहा जाता है। तांबे की विशेषता हम जानते हैं कि यह ऊर्जा अथवा ऊष्मा का सुचालक है और यह त्वरित ऊर्जा अथवा शक्तिवाहक धातु है। उसी प्रकार धातु के अलावा इसके आकार का भी महत्त्व है। अग्निपात्र का आकार उलटे पिरामिड जैसा है। इसमें तीन लहरें या छोटे विभाग होते हैं। इसके आकार के कारण ही इसमें से निकलनेवाली लहरें वातावरण में अधिक जगह व्याप्त रहती हैं। वैज्ञानिकों के अभ्यास से यह सिद्ध हुआ है कि पिरामिड के मध्य में एक उर्जास्रोत कार्यरत रहता है।
अग्निहोत्र में में जलने वाली सामग्री से अलग-अलग रासायनिक यौगिक और मिश्रण निर्मित होते हैं। और अग्निहोत्र के पात्र के आकार की वजह से उनका वातावरण में अधिक पैमाने पर फैलाव होता है तथा हवा के प्रवाह के कारण दूर तक प्रभाव होता है जिसके परिणाम स्वरुप वातावरण में एक प्रकार का सुरक्षा कवच बनता है। रासयनिक प्रक्रिया में विषैली कार्बन मोनो ऑक्साइड गैस का रूपांतर कार्बन डाइऑक्साइड में होता है, जो दिन में वनस्पति को हरित द्रव्य(क्लोरोफिल) बनाने में सहायता करता है और अंत में वातावरण शुद्धि में सहायता करता है।
साथ ही अग्निहोत्र यज्ञ में होने वाले मंत्रोच्चारण की ध्वनि के विशिष्ट प्रकार के कंपन तैयार होते हैं, जिसका प्रभाव मनुष्य के मस्तिष्क पर होता है। जिसके परिणाम स्वरुप मनुष्य का तनाव कम होता है और सकारात्मकता बढ़ती है। अग्निहोत्र से बनने वाली भस्म शक्तिशाली औषधीय गुणों से युक्त पाई गई है। यह भस्म खेती के लिए एक सर्वोत्तम खाद के रूप में पाई गई है। यह भस्म बीजों की अंकुरण क्षमता बढ़ाती है। यह भी पाया गया है कि इस भस्म की वजह से जमीन का उपजाऊपन तथा जलधारण क्षमता काफी बढ़ जाती है।
प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हुआ है कि अग्निहोत्र पर्यावरण का प्रदूषण रोकने में सहायक है। केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के अलग-अलग देशों में अग्निहोत्र का प्रचार-प्रसार देखने में आया है। इतना ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अग्निहोत्र पर चर्चासत्र का आयोजन किया जा रहा है।
अनेक शोधों से यह सिद्ध हो चुका है कि अग्निहोत्र से मनुष्य की एकाग्रता बढ़ती हैं, मानसिक तनाव कम होता है, मन में वातावरण में शांति का अनुभव होता है, सकारत्मकता बढ़ती है, यदि बच्चे अग्निहोत्र करें तो उनका विकास बहुत अच्छा होता है, परिवार सामूहिक रूप से करे तो अपन्नत्व और सामंजस्य संवर्धन होता है। निर्मित सकारात्मकता से दुर्व्यसनों से मुक्त होने में सहायता मिलती है। शरीर की रोगप्रतिरक्षा शक्ति बढ़ती है।