वैद्य राजेश कपूर (जन्म: दिसंबर 1950, राजगढ़, जिला सिरमौर, हिमाचल प्रदेश) आयुर्वेद, गोविज्ञान, जैविक खेती, असाध्य रोग चिकित्सा, छात्र प्रतिभा विकास एवं सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के क्षेत्र में सक्रिय भारतीय वैद्य एवं प्रशिक्षक हैं। वे सेवा शिक्षण संस्थान (न्यास), जी.एम. के अध्यक्ष हैं।
प्रारंभिक जीवन
वैद्य राजेश कपूर का जन्म हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के राजगढ़ में दिसंबर 1950 में हुआ। छात्र जीवन से ही वे संस्कृत, भारतीय ज्ञान परंपरा, सामाजिक चेतना और राष्ट्रहित से जुड़े आंदोलनों में सक्रिय रहे।
अनुसंधान एवं चिकित्सा कार्य
उन्होंने बी.टी. बीजों तथा पौधों के डी.एन.ए. परिवर्तन की एक स्वदेशी तकनीक की खोज की, जिसे एक अभूतपूर्व उपलब्धि माना जाता है। 100 से अधिक वनस्पतियों पर असाध्य रोगों के संदर्भ में उनके प्रयोग सफल बताए जाते हैं। अनेक असाध्य रोगों की चिकित्सा हेतु उन्होंने नवीन योगों का निर्माण किया है।
स्वदेशी गोवंश की चिकित्सा पद्धतियों पर उन्होंने अनेक शोध किए तथा नए योग विकसित किए। असाध्य रोग चिकित्सा, गोविज्ञान और जैविक खेती उनके प्रमुख कार्यक्षेत्र रहे हैं।
प्रशिक्षण, व्याख्यान एवं कार्यशालाएँ
उन्होंने दिल्ली के एक समाजसेवी संगठन के सहयोग से केंद्र सरकार के अधिकारियों के लिए सात वर्षों तक तनाव प्रबंधन पर वार्ताएँ एवं प्रस्तुतियाँ दीं। नागा रेजिमेंट के लिए आयोजित योग प्रशिक्षण शिविरों के परिणामस्वरूप 100 से अधिक नागा जवानों ने मानसिक तनाव के कारण ली जाने वाली शराब का त्याग किया।
छात्र-छात्राओं की स्मरणशक्ति, प्रतिभा तथा शारीरिक क्षमताओं को पाँच दिनों में बढ़ाने की तकनीक का उन्होंने विकास किया, जिसके सफल प्रयोग वेटरनरी कॉलेज जबलपुर तथा एबीईएस इंजीनियरिंग कॉलेज, गाजियाबाद में किए गए।
उन्होंने हरियाणा कृषि विभाग के विकास अधिकारियों को जैविक खेती पर प्रशिक्षण दिया तथा कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर और औद्यानिकी विश्वविद्यालय नौणी में इस विषय पर व्याख्यान दिए। किसानों के लिए जैविक खेती पर सैकड़ों कार्यशालाएँ और विद्यालयों में सैकड़ों शैक्षणिक वार्ताएँ आयोजित कीं।
शैक्षणिक एवं संस्थागत सहभागिता
रामकृष्ण मठ, लखनऊ तथा उनके विवेकानंद अस्पताल में उन्होंने अनेक वार्ताएँ दीं, जिसके लिए उन्हें ट्रस्ट के अध्यक्ष पूज्य स्वामी जी द्वारा सम्मानित किया गया।
उन्होंने विश्वविद्यालय शिमला की सहभागिता से “अंग्रेजों के काल में भारत की शिक्षा और जाति व्यवस्था” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की। पालमपुर कृषि विश्वविद्यालय (प्रदेश सरकार एवं गोरक्षा एवं संवर्धन परिषद की भागीदारी) में गोविज्ञान पर राष्ट्रीय संगोष्ठी के वे समन्वयक रहे। दीनदयाल विश्वविद्यालय, मथुरा के साथ मिलकर भी उन्होंने गोविज्ञान पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया।
पत्रकारिता एवं लेखन
वे अनेक वर्षों तक ‘गवाक्ष भारती’ मासिक पत्रिका के संचालक एवं संपादक रहे। उन्होंने सोलन, हिमाचल प्रदेश की ‘शूलिनी स्मारिका’ का संपादन भी किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे कई वर्षों तक सक्रिय रहे। ई-पत्रिकाओं में उनके अनेक लेख प्रकाशित एवं प्रशंसित हुए, जिसके लिए उन्हें प्रवक्ता डॉट कॉम द्वारा सम्मानित किया गया।
उन्होंने “आधुनिक जीवन शैली के रोग: कारण और निवारण” पुस्तक भी लिखी है। जिसके 6 संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं।

उन्होंने भारत के गौरवशाली इतिहास पर दुर्लभ साहित्य, संदर्भ सामग्री तथा दुर्लभ पुस्तकों की सूची का संकलन भी किया।
सामाजिक एवं राष्ट्रीय गतिविधियाँ
छात्र जीवन में, वर्ष 1975 में, उन्होंने हिमाचल प्रदेश में पहली बार संस्कृत छात्रसंघ का गठन किया और इसके संस्थापक प्रदेश अध्यक्ष रहे। संस्कृत विद्यालयों को महाविद्यालय का दर्जा दिलाने हेतु उन्होंने प्रदेशव्यापी आंदोलन का नेतृत्व किया, जिसमें सफलता प्राप्त हुई।
आपातकाल के दौरान वे भूमिगत रहकर साहित्य प्रकाशन में सक्रिय रहे। मंडी में हिमाचल दिवस पर सत्याग्रह किया तथा नौ माह की जेल यात्रा की। इस दौरान उन्होंने मंडी, शिमला, नाहन और सोलन जेलों में समय बिताया। मंडी जेल में उन्होंने 18–20 दिनों का अनशन किया। मंडी सत्याग्रह 25 जून 1976 को हुआ।
1976 से 1980 तक वे बिलासपुर (हिमाचल प्रदेश) में संघ प्रचारक रहे और उसी काल में जेल यात्रा भी की। रामजन्मभूमि आंदोलन में उन्होंने अयोध्या में लाठी और गोली का सामना किया तथा कई वर्षों तक आंदोलन में भागीदारी निभाई।
संस्थाओं की स्थापना
वे भारतीय इतिहास संकलन योजना समिति (हिमाचल प्रदेश) के संस्थापक सदस्य रहे। भारत विकास परिषद, सोलन के संस्थापक सदस्य तथा श्री रामायण अखंडपाठ समिति के संस्थापक रहे। इसके अतिरिक्त उन्होंने अनेक सामाजिक संस्थाओं का गठन एवं संचालन किया।
वर्तमान कार्य
वर्तमान में वैद्य राजेश कपूर छात्र प्रतिभा विकास, तनाव प्रबंधन, असाध्य रोग चिकित्सा, गोविज्ञान एवं जैविक खेती पर शोध, प्रयोग एवं प्रशिक्षण कार्यों में संलग्न हैं। उन्होंने पाँच विषयों पर विशेष प्रशिक्षण पाठ्यक्रम का निर्माण किया है, जिनमें गोविज्ञान (गोवंश चिकित्सा, जैविक खेती, पंचगव्य उत्पाद, औषधि निर्माण), असाध्य रोगों की सरल चिकित्सा, कौशल विकास, मानसिक एवं शारीरिक क्षमताओं का विकास तथा भारत का वास्तविक गौरवपूर्ण इतिहास शामिल हैं। इन पाठ्यक्रमों के माध्यम से उन्होंने सैकड़ों गोपालकों एवं किसानों को प्रशिक्षण दिया है।
प्रशस्तियाँ एवं सम्मान
पंडित दीनदयाल विश्वविद्यालय, मथुरा के साथ गोविज्ञान पर राष्ट्रीय सेमिनार के अवसर पर सेवा शिक्षण संस्थान के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश के राज्यपाल एवं भारत सरकार के कृषि मंत्री से शुभकामना संदेश प्राप्त हुए।
उन्हें हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री से सम्मान पत्र तथा लोकतंत्र प्रहरी सम्मान एवं सम्मान पत्र प्राप्त हुआ। हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल श्री वी.एस. कोकजे की अध्यक्षता में आयोजित सेमिनार में वे कैंसर विषय पर मुख्य वक्ता रहे।
किंग जॉर्ज चिकित्सालय विश्वविद्यालय, अंबेडकर विश्वविद्यालय, वेटरनरी विश्वविद्यालय जबलपुर (डीन द्वारा), एबीईएस इंजीनियरिंग कॉलेज गाजियाबाद से उन्हें प्रशस्ति एवं आभार पत्र प्राप्त हुए। बिहार के एक बड़े दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ के अधिकारियों एवं सदस्यों के लिए उन्होंने गोविज्ञान पर ऑनलाइन प्रशिक्षण दिया।
उन्होंने नागा रेजिमेंट में पाँच दिवसीय योग साधना प्रशिक्षण, देव सुमन विश्वविद्यालय उत्तराखंड में स्वास्थ्य कार्यशाला आयोजित की। औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी, सोलन में वे विशिष्ट अतिथि तथा चितकारा विश्वविद्यालय, बद्दी में मुख्य अतिथि रहे।

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