ईरान का इतिहास केवल घटनाओं और शासकों की कथा नहीं है, बल्कि उन प्रतीकों की भी कहानी है जिन्होंने सदियों तक उसकी पहचान को आकार दिया। इन्हीं प्रतीकों में ईरान का पुराना राष्ट्रीय ध्वज एक विशेष स्थान रखता है। यह ध्वज उस दौर का प्रतिनिधित्व करता है जब ईरान ने अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक राज्य व्यवस्था और राजशाही के साथ जोड़ने का प्रयास किया। इसके रंग, इसके चिह्न और इसके परिवर्तन—सब मिलकर ईरान की राजनीतिक, सांस्कृतिक और वैचारिक यात्रा को प्रतिबिंबित करते हैं।
1979 की इस्लामी क्रांति से पहले ईरान का राष्ट्रीय ध्वज तीन क्षैतिज रंगों—हरा, सफेद और लाल—से बना होता था। इसके केंद्र में शेर और सूरज का प्रसिद्ध प्रतीक स्थित रहता था, जो ईरानी इतिहास में सदियों से प्रयुक्त होता आ रहा था। यह केवल एक सजावटी चिह्न नहीं था, बल्कि ईरान की आत्मा, शक्ति और निरंतरता का दृश्य रूप था।
हरे रंग को इस्लाम से जोड़ा जाता था, लेकिन इसके साथ-साथ यह विकास, उर्वरता और आशा का भी प्रतीक था। सफेद रंग शांति, नैतिकता और सत्यनिष्ठा को दर्शाता था, जबकि लाल रंग साहस, संघर्ष और मातृभूमि की रक्षा में दिए गए बलिदानों का संकेत देता था। इन तीनों रंगों का संयोजन ईरान की धार्मिक, नैतिक और वीर परंपराओं को एक साथ प्रस्तुत करता था।
ध्वज के केंद्र में स्थित शेर और सूरज का प्रतीक विशेष रूप से गहन अर्थ रखता था। शेर शक्ति, वीरता और आत्मबल का प्रतीक था, जिसकी जड़ें प्राचीन फ़ारसी कथाओं और साम्राज्यवादी परंपराओं में थीं। वहीं सूरज जीवन, प्रकाश और सभ्यता की निरंतरता का प्रतीक था। इन दोनों का संयुक्त रूप इस्लाम-पूर्व और इस्लामी काल—दोनों को जोड़ने वाला सेतु बन गया था। यह प्रतीक राजशाही की वैधता, सांस्कृतिक गौरव और राष्ट्रीय आत्मसम्मान को दर्शाता था।
इस ध्वज का औपचारिक स्वरूप 19वीं शताब्दी में क़ाजार वंश के शासनकाल में स्थापित हुआ, लेकिन इसे सबसे अधिक पहचान पहलवी राजवंश के समय मिली। 1925 से 1979 तक, रज़ा शाह और मोहम्मद रज़ा शाह के शासन में यह ध्वज ईरान के आधुनिकीकरण की महत्वाकांक्षाओं का प्रतीक बना। स्कूलों, सरकारी भवनों, सैन्य परेडों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह ध्वज एक ऐसे राष्ट्र को दर्शाता था जो आधुनिक बनना चाहता था, लेकिन अपनी ऐतिहासिक जड़ों से कटना नहीं चाहता था।
1979 की इस्लामी क्रांति ने ईरान की दिशा को पूरी तरह बदल दिया। राजशाही का अंत हुआ और इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई। इस परिवर्तन के साथ ही राष्ट्रीय प्रतीकों को भी नया रूप दिया गया। हरा, सफेद और लाल रंग तो बनाए रखे गए, लेकिन शेर और सूरज के प्रतीक को हटाकर एक नया इस्लामी चिह्न अपनाया गया। यह बदलाव केवल प्रतीकात्मक नहीं था; यह अतीत की राजशाही और पूर्व-इस्लामिक विरासत से एक वैचारिक दूरी बनाने का संकेत था।
इसके बावजूद, शेर और सूरज वाला पुराना ध्वज ईरानी समाज की स्मृति से कभी पूरी तरह गायब नहीं हुआ। कई ईरानियों के लिए यह आज भी राष्ट्रीय गौरव, सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक निरंतरता का प्रतीक है। विशेष रूप से ईरानी प्रवासी समुदायों में, विरोध प्रदर्शनों, सोशल मीडिया अभियानों और सांस्कृतिक आयोजनों में यह ध्वज बार-बार दिखाई देता है।
हाल के वर्षों में इस पुराने ध्वज के प्रति रुचि में स्पष्ट वृद्धि देखी गई है। युवा ईरानी, चाहे वे देश के भीतर हों या विदेश में, अपने इतिहास और पहचान को नए दृष्टिकोण से देखने का प्रयास कर रहे हैं। उनके लिए शेर और सूरज केवल राजशाही का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह ईरान की प्राचीन सभ्यता, आत्मसम्मान और सांस्कृतिक लचीलापन का संकेत है। कला, साहित्य, डिज़ाइन और डिजिटल मीडिया में भी इस प्रतीक की वापसी दिखाई देती है।
यह पुनरुत्थान इस बात को रेखांकित करता है कि राष्ट्रीय पहचान किसी एक राजनीतिक विचारधारा तक सीमित नहीं होती। ईरान का पुराना ध्वज उसके इस्लाम-पूर्व अतीत और आधुनिक चेतना के बीच एक पुल की तरह कार्य करता है। इसके रंग और प्रतीक संघर्ष, परिवर्तन और स्मृति की उस लंबी यात्रा की कहानी कहते हैं, जिसने ईरान को आज का ईरान बनाया है।
अंततः, ईरान का पुराना ध्वज केवल इतिहास की वस्तु नहीं है। यह एक जीवित सांस्कृतिक प्रतीक है, जो यह दिखाता है कि कैसे पहचान, स्मृति और परंपरा राजनीतिक परिवर्तनों के बावजूद जीवित रहती हैं। शेर और सूरज वाला ध्वज आज भी ईरानियों के मन में उनके अतीत, उनके संघर्ष और उनकी सांस्कृतिक विरासत की याद दिलाता है—और यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।
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