व्रत/ उपवास का वैज्ञानिक महत्व

उपवास का शाब्दिक अर्थ है, उप अर्थात्  निकट और वास अर्थात्  रहना। इस प्रकार उपवास का अर्थ हुआ भगवान के निकट रहना।

भारत के लोगों के साथ आज एक समस्या हो गई है कि जब तक विदेशी लोग भारतीय शोध और चीजों पर अपना ठप्पा लगाकर बाजार में नहीं उतारते तब तक हम अपने उन्नत ज्ञान और विज्ञान का महत्व नहीं समझते। कुछ ऐसा ही है व्रत और उपवास के साथ भी। हम जिसे सहस्त्राब्दियों से व्रत या उपवास कहते हैं उसे पश्चिमी वैज्ञानिक आज ऑटोफैगी कहते हैं। हम सबको जानकार आश्चर्य होगा कि जापानी कोशिका जीवविज्ञानी (वैज्ञानिक) योशिनोरी ओहसुमी ने 2016 में ऑटोफैगी प्रक्रिया पर किये अपने शोध के लिए चिकित्सा में नोबेल पुरस्कार जीता था। ऑटोफैगी प्रक्रिया में कोशिकाएं अपनी सामग्री को पुनर्चक्रित (रिसायकल) और नवीनीकृत करती हैं। उपवास ऑटोफैगी प्रक्रिया को सक्रिय करता है, जो आयु बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करने में सहायता करता है और इसे कोशिका नवीकरण पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।

ऑटोफैगी क्या है?

भूख के दौरान, कोशिकाएं प्रोटीन और अन्य कोशिका घटकों को तोड़ती हैं और ऊर्जा के लिए उनका उपयोग करती हैं। ऑटोफैगी के दौरान, कोशिकाएं वायरस और बैक्टीरिया को नष्ट करती हैं और क्षतिग्रस्त संरचनाओं से छुटकारा पाती हैं। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो कोशिका के स्वास्थ्य, नवीनीकरण और अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण है।

National Center for Biotechnology Information (NCBI) में प्रकाशित एक वैज्ञानिक शोध के अनुसार, उपवास (Intermittent Fasting) के दौरान शरीर में Autophagy की प्रक्रिया तेज़ हो जाती है, जिससे पुरानी और खराब कोशिकाएँ नष्ट होती हैं और नई स्वस्थ कोशिकाओं का निर्माण होता है। यह प्रक्रिया शरीर के डिटॉक्स और रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

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हम जानते हैं मनुष्य शरीर भी एक यंत्र की तरह है। हम जब भी भोजन करते हैं उसे पचाने में शरीर को कार्य करना पड़ता है। व्रत अथवा उपवास करने से शरीर की यांत्रिक प्रणाली अर्थात्  पाचन तंत्र को आराम मिलता है और इसका पुनर्निर्माण (मरम्मत) आदि कार्य स्वतः होता है।  इसके परिणाम स्वरुप हमारे  पाचन-तंत्र की कार्य क्षमता बढ़ती है। उपवास से अपने इंद्रियों को वश में करने की आदत विकसित होने में मदद मिलती है, उसी प्रकार इच्छाओं पर अंकुश लगने से मानसिक शांति मिलती है।

दूसरे व्रत और उपवास आयुर्वेद का महत्त्वपूर्ण अंग है। आयुर्वेद के अनुसार शरीर में संचित हानिकारक विषैले पदार्थों के कारण ही अनेकानेक रोग होते हैं। व्रत अथवा उपवास करने से इन विषाक्त पदार्थों में कमी आती हैं। पूर्ण रूप से किया उपवास शरीर के लिए अत्यंत लाभकारी है। उपवास करने से शरीर में तनाव और वातोन्माद में कमी आती है। आधुनिक रिसर्च से यह सिद्ध हुआ है कि उपवास से अनेक रोगों जैसे मधुमेह, कैंसर और अल्जाइमर आदि पर भी नियंत्रण किया जा सकता है।

उपवास से शरीर में दुर्बलता नहीं आती है। बल्कि शरीर का शुद्धिकरण होता है और शरीर संतुलित होकर कार्य करता है। उपवास से पाचन-क्रिया होती है और  शरीर के यकृत (लिवर), मूत्रपिंड (किडनी), पाचक ग्रंथि (पैनक्रेअस) जैसे अभिन्न अंगों की कार्यक्षमता संवर्धन होता है। व्रत धर्म के मार्ग पर चलने हुए शरीर शोधन की एक वैज्ञानिक पद्धति है।

व्रत अथवा उपवास करने से शारीरिक लाभ:

रक्त का शुद्धीकरण

व्रत रखने से रक्त का शुद्धीकरण होता है। आतों की सफाई भी होती है। उदर को आराम मिलता है। उत्सर्जन तंत्र और पाचन तंत्र, दोनों ही अपनी अशुद्धियों से छुटकारा पाते हैं।

रोगों से मुक्ति

व्रत कई तरह के रोगों से मुक्ति पाने का मार्ग है। इससे स्वशन प्रक्रिया भी ठीक होती है। व्रत, उपवास रखना हृदय के लिए बहुत अच्छा माना गया है। व्रत करने से कैलोस्ट्रोल स्तर को घटता है। अर्थराइटिस, अस्थमा, जैसी बीमारियों में यह लाभप्रद होता है। ऐसा वैज्ञानिक शोध बताते हैं।

संक्षिप्त में लिखा जाये तो व्रत और उपवास की वैज्ञानिकता कुछ ऐसे वर्णित की जा सकती है। भोजन बनाने के लिए उपयोग होने वाली सामग्री अर्थात्   ‘अन्न’ में मादकता होती है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो इसमें भी एक प्रकार का नशा होता है। भोजन करने के तुरंत बाद हम सबने ध्यान दिया होगा कि नींद आने लगती है और आलस छा जाता है। विज्ञान की भाषा में इसे शरीर में ग्लूकोज़ स्तर बढ़ना कहते हैं।

वैज्ञानिक कहते हैं कि सप्ताह में एक दिन तो व्रत जिसे अंग्रेजी भाषा में फास्ट कहते हैं जरूर रखना ही चाहिए। इससे आमाशय, यकृत एवं पाचनतंत्र को विश्राम मिलता है तथा उसकी स्वतः ही सफाई हो जाती है। इस रासायनिक प्रक्रियाअर्थात्  लुब्रिकेशन से पाचनतंत्र मजबूत हो जाता है तथा व्यक्ति की आंतरिक शक्ति के साथ-साथ उसकी आयु भी बढ़ती है।

FAQ:

Q1. क्या उपवास से सच में Autophagy बढ़ती है?
Ans. हाँ, वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि उपवास के दौरान शरीर में Autophagy की प्रक्रिया सक्रिय हो जाती है, जिससे खराब कोशिकाएँ नष्ट होती हैं।

Q2. क्या रोज़ उपवास करना सुरक्षित है?
Ans. नहीं, रोज़ लंबा उपवास करना सभी के लिए सुरक्षित नहीं होता। हफ़्ते में 1–2 बार हल्का उपवास अधिक सुरक्षित माना जाता है।

Q3. क्या व्रत-उपवास मधुमेह (Diabetes) में फायदेमंद है?
Ans. कुछ शोधों में fasting से insulin sensitivity बढ़ने की बात सामने आई है, लेकिन मधुमेह के रोगी डॉक्टर की सलाह के बिना उपवास न करें।

घंटनाद और शंखनांद का वैज्ञानिक प्रभाव

सनातन धर्म आधारित भारतीय परम्परायें पवित्र हैं और इनमे सम्मिलित प्रत्येक रीति-रिवाज का एक व्यापक वैज्ञानिक मूल्य और महत्व है। हमारी हिन्दू संस्कृति में पूजा पाठ का एक विशिष्ट महत्व है। जब भी घर में या मन्दिर में किसी भी प्रकार का पूजा-पाठ या अनुष्ठान होता है, तब घंटी अपरिहार्य रूप से बजाई जाती है। दूसरे, हम जब भी मंदिर जाते हैं, तब दर्शन हेतु मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने से पहले वहाँ लगी घंटी अवश्य बजाते हैं। क्या कभी हमने विचार किया है आखिर यह घंटनाद क्यों किया जाता है? भारत के हर छोटे बड़े मंदिर में छोटी या बड़ी घंटी अवश्य होती है। घर के पूजा गृह या मंदिर में लटकने वाली घंटी न हो तो हाथ से बजाने वाली घंटी होती है। आखिर इस घंटी अथवा घंटनाद का क्या महत्व है? घंटी बजाने के पीछे ऋषियों का नाद विज्ञान है। जब भी घंटनाद होता है, तब ध्वनि तरंगे उत्पन्न होती हैं, उन तरंगों का मनुष्य के मन-मस्तिष्क और शरीर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार स्कंद पुराण के अनुसार घंटनाद से जो ध्वनि निकलती है, वह ‘ॐ’ की ध्वनि के समान होती है। पुराण आधारित जानकारी से पता चलता है कि सृष्टि सृजन के समय भी ‘ॐ’ की ध्वनि ही हुई थी। दूसरे मंदिर में विराजमान भगवान का प्रतीक मूर्ति अथवा अर्च विग्रह के रूप में भगवान को जागृत करने में भी घंटनाद का महत्व है। दूसरे, घंटी बजाने से पूजा का प्रभाव बढ़ जाता है और एक विशेष वातावरण का निर्माण होता है।

आगम शास्त्रों के अनुसार घंटी बजाने से बुरे प्रभावों का निवारण होता है। पुरातन समय से इस प्रकार की मान्यता भी है कि जिस मंदिर में घंटनाद होता है, वह स्थान जागृत स्थान होता है और उस मंदिर में भगवान जागृत अवस्था में वास करते हैं। इन्ही जागृत भगवान को घंटनाद के माध्यम से दर्शनार्थी श्रद्धालु के आने की सूचना मिलती है। पूजा और आरती के समय होने वाला घंटनाद से आसपास के श्रद्धालुओं को यह सुचना मिल जाती है कि आरती का समय हो गया है। आरती के समय बजने वाले छोटे बड़े घंटी घड़ियाल आदि मंदिर में उपस्थित लोगों के मन में भक्ति भाव का उफान लातें है। घंटनाद की ध्वनि जहाँ तक जाती है वह सम्पूर्ण वातावरण शुद्ध और मंगलमय होता है। एक मुख्य कारण और है, भगवत पूजा में विशेष ध्यान और एकाग्रता की आवश्यकता होती है, लेकिन मन के चंचल होने के कारण और मानवीय स्वभाव के कारण मन भटक सकता है अथवा बाहर से आने वाले शोर शराबे के कारण विघ्न बाधा उत्पन्न हो सकती है। घंटनाद के परिणामस्वरूप मन एकाग्र और नियंत्रित रहता है और पूजा निर्बाध पूर्ण होती है।

घंटनाद के पीछे वैज्ञानिक आधार :

विज्ञान की जब बात आती है तब घंटनाद के परिप्रेक्ष्य में ‘तरंगों’ अथवा कंपन पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है। भौतिक विज्ञान बताता है साउंड वेव्स अर्थात्  ध्वनि तरंगे। भौतिक विज्ञान के विद्यार्थियों ने यह वाक्य अवश्य पढ़ा होगा कि ‘ध्वनि भी एक शक्ति अथवा ऊर्जा’ होती है। अब थोड़ा धातु विज्ञान के अनुसार देखें तो घंटियों का निर्माण पीतल, ताँबा, कैडमियम और जस्ता जैसी धातुओं (मेटल्स) के मिश्रण से होता है। ऊपर से घंटी का आकार भी विशेष महत्व का होता है।

धातुओं के मिश्रण से बनी घंटी से होने वाले घंटनाद के कारण उत्पन्न ऊर्जा की सूक्ष्म तरंगे अर्थात्  कंपन वातावरण में दूर तक जाता है और सूक्ष्म विषाणुओं और जीवाणुओं को नष्ट करती है। इससे वातावरण शुद्ध होता है। यही कारण है कि जिन स्थानों पर घंटी बजने की ध्वनि नियमित रुप से आती रहती है, वहाँ का वातावरण सदैव सकारात्मक, शुद्ध और पवित्र बना रहता है। इससे शरीर में सकारात्मक शक्तियों का संचार होता है और नकारात्मकता दूर होती है। इसके साथ घंटियों की ध्वनि का मनुष्यों के मष्तिक और मन पर भी गहन प्रभाव पड़ता है। इससे मन में शान्ति का आभास होता है और त्तनाव का स्तर (स्ट्रेस लेवल) भी कम होता है। लोगों द्वारा अपने घर के दरवाजों और खि‍ड़कियों पर ‘विंड चाइम्स’ लगवाने के पीछे भी यही कारण होता है कि विंड चाइम्स की ध्वनि से नकारात्मक शक्तियां घर से बाहर हटती रहें और सकारात्मक शक्तियां घर में प्रवेश कर सकें।

घंटनाद का हमारी एकाग्रता बढ़ाने में अहम भूमिका होती है। मनोविज्ञान के अनुसार एक दिन में मनुष्य के मस्तिष्क में हजारों विचार आते हैं। ये विचार भूतकाल, वर्तमान और भविष्य से जुड़े होते हैं। कई बार दूसरों से संबंधित विचार भी आते हैं। कुल मिलाकर मानव मस्तिष्क दिन भर व्यस्त रहता है। जैसे ही घंटनाद होता है मन-मस्तिष्क विशेष कार्य या विचार (पूजा, आरती) पर एकाग्र हो जाता है।  घंटी की ध्वनि सुनते ही, उत्पन्न हुई ध्वनि की तरंगे (कंपन) कुछ क्षणों के लिए हमारे मस्तिष्क में चलने वाले विचार-द्वन्द को खंडित कर देता है और हम वर्तमान काल में आ जाते हैं। जब कभी घंटानाद होता है, तब जो कंपन अथवा अनुकंपन (जिसे अंग्रेजी भाषा में रेजोनेंस कहते है) का निर्माण होता है, यह अनुकम्पन तुरंत हमारे मस्तिष्क के बाएँ और दाहिने पिंडक को प्रभावित करता है। इस ध्वनि से निर्मित अनुकंपित ध्वनि हमारे मस्तिक में गूँजती रहती है।  इससे मस्तिष्क में एक प्रकार का निर्वात निर्माण होता है और हमारी एकाग्रता बढ़ जाती है। यदि हमने कभी ध्यान दिया हो तो और स्वयं घंटनाद किया हो तो एवं यह घंटनाद की ध्वनि तुरंत मानसिक शांति की अनुभूति देती है। जिसके कारण हम एकाग्र भाव से मंदिर में विराजमान भगवान की मूर्ति पर ध्यान केंद्रित कर पाते हैं। कुल मिलाकर घंटनाद के पीछे ध्वनि विज्ञान कार्य करता है।

शंखनाद का वैज्ञानिक महत्व

हिन्दू धर्म में शंख का अपना एक विशिष्ट महत्व है। हर प्रकार की पूजा और अनुष्ठान में शंखनाद किया जाता है। ध्वनि और संगीत मानव मन और भावनाओं की स्थिति को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं। कम ध्वनि में मधुर संगीत सुनने से मन को शांति का अनुभव होता है। शंख से उत्पन्न ध्वनि तरंगें सकारात्मक मनोवैज्ञानिक स्पंदनों को बढ़ाती हैं और एकाग्रता को बढ़ाती हैं।  धार्मिक दृष्टि से देखने पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के हाथों में शंख होता है। महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत में वर्णित कुरुक्षेत्र के युद्ध से पहले श्रीमद भगवत गीता उपदेश में अलग-अलग नाम के शंखों और शंखनाद का उल्लेख हुआ है। शंखनाद को ध्यान से सुनने पर ‘ॐ’ की ध्वनि सुनाई देती है। घंटनाद की तरह शंखनाद भी ध्वनि विज्ञान पर आधारित है। शंखनाद से उत्पन्न होने वाली तरंगे भी वातावरण शुद्धिकरण करती है और सकारात्मकता का निर्माण करती है। 

ऐसा माना जाता है कि शंख बजाने से स्वास्थ्य पर विशेष रूप से हृदय और श्वसन प्रणाली पर बहुत अधिक लाभकारी प्रभाव पड़ता है। वैज्ञानिक दृष्टि से शंख  कैल्शियम और मैग्नीशियम से बना होता है। वैज्ञानिक शोध में यह पाया गया है कि नियमित रूप से शंख बजाने से जीभ की चर्बी कम होती है और कई ओरोफेशियल समस्याओं से बचाव होता है।

तंत्रिका विज्ञान का कहना है कि मानव मस्तिष्क का ध्वनि और भावनात्मक अवस्थाओं के बीच एक मजबूत बंधन है। शंख बजाना और उसकी ध्वनि और शंख को स्वयं सुनना अपने आप में बहुत लाभदायक होता है। पृथ्वी की ब्रह्मांडीय ऊर्जा शंख में प्रवेश करने पर बढ़ जाती है। ये कंपन सकारात्मक तरंगो को चारों ओर फैलाते हैं और आसपास से नकारात्मक ऊर्जा को मिटाते हैं। शंख बजाने से वातावरण पवित्र, शुद्ध होता है और व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास के लिए अनुकूल होता है। यह आशा, दृढ़ संकल्प और इच्छाशक्ति जैसे सकारात्मक मनोवैज्ञानिक स्पंदनों को भी बढ़ाता है। इसे शंखनाद सुनने वाले लोग भी महसूस कर सकते हैं। शंख बजाने से हकलाहट, अस्थमा, खांसी, यकृत और तिल्ली की बीमारियों से पीड़ित बच्चों को ठीक किया जा सकता है ऐसे वैज्ञानिक शोध हैं।  नियमित रूप से शंख बजाने से हृदय में रुकावट (हार्ट ब्लॉकेज) कम होती है और श्वसन प्रणाली में सुधार होता है। शंख का वैज्ञानिक नाम टर्बिनेल्ला पायरम है।

प्रतिदिन शंख बजाने के लाभ:

सुरक्षित पर्यावरण: शंखनाद पर्यावरण की प्राकृतिक चिकित्सा है। शंखनाद की ध्वनि की विशेष आवृत्ति, मानव आंखों के लिए अदृश्य कई हानिकारक कीटाणुओं, बैक्टीरिया और विषाणुओं को तुरंत नष्ट कर देती है। लय, ध्वनि और कंपन वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा और आवृत्ति पैदा करते हैं।

अच्छा स्वास्थ्य: शंख बजाने से हृदय, वाक् चिकित्सा, श्वसन उपचार और मनोवैज्ञानिक उपचार में मदद मिलती है।

मजबूत फेफड़े: चूंकि शंख में हवा फूंकने में बहुत मेहनत लगती है, इसलिए यह डायाफ्राम, छाती और गर्दन की मांसपेशियों के लिए एक उत्कृष्ट व्यायाम है। शंख बजाने के लिए फेफड़ों की मांसपेशियों को पूरी तरह से विस्तारित करने की आवश्यकता होती है, इस प्रकार उनकी कार्यक्षमता में सुधार होता है। यह फेफड़ों और स्वरयंत्र की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है

वाक्तंतु (वोकल कॉर्ड) के लिए व्यायाम: शंख बजाने से थायरॉयड ग्रंथियों और वोकल कॉर्ड का भी व्यायाम होता है, जिससे बोलने संबंधी किसी भी समस्या को ठीक करने में मदद मिलती है।

वृधावस्था विरोधी (एंटी एजिंग): यह चेहरे के लिए बहुत अच्छा एंटी एजिंग उपचार है। यह चेहरे के लिए एक उत्कृष्ट दैनिक व्यायाम है, क्योंकि शंख बजाने से चेहरे की मांसपेशियाँ फैलती है।

मानसिक स्वास्थ्य: मस्तिष्क तरंग डेटा रिकॉर्डिंग के अनुसार, शंख द्वारा उत्पन्न ध्वनि तरंगें सकारात्मक मनोवैज्ञानिक स्पंदनों को बढ़ाती हैं। ध्वनि के कारण मस्तिष्क शांत और ग्रहणशील अवस्था में होता है, इस प्रकार एकाग्रता और प्रदर्शन में सुधार होता  है।

तनाव रोधक (एंटी स्ट्रेस): ऐसे कई अध्ययन हैं जो तनाव को दूर करने के लिए शंख के उपयोग को एक चिकित्सा के रूप में बढ़ावा देते हैं।  साथ ही ध्वनि का अवसाद, चिंता, तनाव, उच्च रक्तचाप, अनिद्रा आदि व्याधियों से पीड़ित लोगों पर उपचारात्मक प्रभाव पड़ता है।

हवन का दैनिक जीवन में वैज्ञानिक महत्व

हवन का दैनिक जीवन में वैज्ञानिक महत्व

यज्ञ और हवन सनातन धर्म (हिन्दू) परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। सनातन परंपरा के अनुयायी मूल रूप से अग्नि के उपासक रहे हैं। वेदों में ऋग्वेद का प्रथम शब्द ही अग्नि है ‘अ॒ग्निमी॑ळे पु॒रोहि॑तं य॒ज्ञस्य॑ दे॒वमृ॒त्विज॑म्। होता॑रं रत्न॒धात॑मम्।’ इसका अर्थ यह हुआ कि यज्ञ अग्नि-विज्ञान से जुड़ा है।

शास्त्रों के अनुसार अग्नि पूजा का दर्शन है। प्रकृति और देवी देवताओं के प्रति जो हमारा दायित्व है, उसका निर्वहन आवश्यक है। यज्ञ, हवन, अग्निहोत्र का लौकिक मुख्य उद्देश्य वातावरण को शुद्ध करना है। यज्ञ के लिए जो अग्निकुंड तैयार किए जाते हैं, वे शुद्ध विज्ञान अर्थात्  गणित व रेखागणित के आधार पर निर्मित किये जाते  हैं।

इसके अतिरिक्त यज्ञ में डाली जाने वाली सामग्री जैसे अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियाँ, तिल, जौ, चावल, गुग्गल और गाय का शुद्ध घी आदि का भी वैज्ञानिक ढंग से चयन होता था। ये सभी पदार्थ जब अग्नि में स्वाहा होते हैं तो सूक्ष्म और विस्तारित होकर वायुमंडल में विलीन हो जाते हैं। अग्नि में डालने से पूर्व मंत्रोच्चारण होता है जो उन पदार्थों को परिलक्षित कर देता है अर्थात् अग्नि में डाले जानेवाले पदार्थ को सूक्ष्म रूप से किस दैवीय शक्ति को भेजा जा रहा है, वह बोले जाने वाले मंत्र से जाना जाता है। मंत्र के अनुसार अग्नि उस पदार्थ के सूक्ष्म रूप को निहित देव या देवी के पास पहुँचा देती है। हवन की अग्नि जड़ी-बूटियों, मेवा व अन्य पदार्थों की भस्म बना देती है, जो एक सशक्त औषधि बन जाती है, जिसे बाद में प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं में बाँट दिया जाता है।

यज्ञ अथवा हवन की परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है। यज्ञ के बारे में सर्वाधिक यजुर्वेद में बताया गया है। रामायण, महाभारत में हमने अनेक छोटे बड़े यज्ञों के बारे में पढ़ा है, जैसे पुत्रेष्ठि यज्ञ, अश्वमेध यज्ञ और राजसूय यज्ञ आदि।

यज्ञ और हवन में थोड़ा सा अंतर होता है।  हवन ‘पंच महायज्ञ’ का ही एक भाग है। हवन अधिकतर अपने स्वयं के अथवा परिवार के दैनंदिन जीवन में आनेवाली समस्याओं के निराकरण, समाधान, आत्मिक उन्नति, शुद्धि, आरोग्य, लंबी उम्र, शांति तथा अपने आसपास के वातावरण के शुद्धिकरण के लिए किया जाता है। हवन हमारे जीवन के अलग-अलग सुअवसरों पर, जैसे विवाह, गृह प्रवेश, भूमि पूजन आदि के समय भी किया जाता है। होम या हवन घर अथवा ऑफिस में भी हो सकता है। हवन कुछ घंटे या एकाध दिन का होता है।

किंतु यज्ञ का स्वरुप व्यापक अथवा बड़ा होता है, यज्ञ कई दिनों तक चलता रहता है। ‘महायज्ञ’ तो कई महीनों तक चलता है। यज्ञ पूरे विश्व ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि, सभी मस्तिष्क और आत्माओं की अलग-अलग प्रचलित ऊर्जाओं के साथ संपर्क स्थापित करने का एक मार्ग या माध्यम है। यज्ञ का लाभ व्यक्तिगत न होकर, पूरे विश्व के लिए है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बात करें तो भौतिक दुनिया में दो प्रकार की ऊर्जा अथवा कार्य शक्ति जिसे अंग्रेजी में एनर्जी कहा जाता है, पाई जाती है। पहली है, ताप या उष्णता और दूसरी है, ध्वनि। इन दोनो ही ऊर्जाओं का उपयोग यज्ञ में किया जाता है। ताप ऊर्जा जहाँ यज्ञ की अग्नि से मिलती है वहीं ध्वनि ऊर्जा मंत्रोच्चारण से निर्माण होती है। संस्कृत के हर मंत्र का हमारे ऋषियों ने इस प्रकार निर्माण किया है कि हर शब्द तथा उस शब्द का विशेष उच्चार से निर्माण होने वाली ध्वनि लहरें ऊर्जा निर्माण करती हैं। इस प्रकार वैदिक मंत्रोच्चार और अग्नि व अग्नि में डाली समिधा के प्रभाव से दोनों ऊर्जाओं के मिश्रण से निर्माण होनेवाली इस ऊर्जा से भौतिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं।

वर्ष 2009 में टाइम्स ऑफ़ इंडिया में एक समाचार छपा था जिसका शीर्षक था,’ हवन फॉर बैक्टीरिया फ्री होम्स: स्टडी। यह अध्ययन राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के वैज्ञानिकों ने अपनी एक रिसर्च में हवन या यज्ञ करने की शास्त्रीय विधि का प्रयोग करके किया था। इस अध्ययन में पाया गया था कि आम की लकड़ी के साथ यदि शुद्ध हवन सामग्री का प्रयोग किया जाए तो एक घंटे के भीतर ही हवन कक्ष में उपस्थित जीवाणु और विषाणु का स्तर 94 प्रतिशत कम हो जाता है। इस वर्ष अर्थात्  जनवरी 2022 में टाइम्स ऑफ़ इंडिया में भारत के पतंजलि संस्थान के शोध को लेकर भी समाचार प्रकाशित हुआ है। जिसमें हवन से वातावरण शुद्धिकरण और कीटाणुओं के निदान की बात की गई है।

यज्ञ अथवा हवन को लेकर एक नाम अथवा प्रक्रिया अथवा परंपरा और भी है जो युगों से प्रचलित है उसका नाम है ‘अग्निहोत्र’। चाहे रामायण हो या महाभारत यज्ञ अनुष्ठान अथवा अग्निहोत्र के बारे में प्रचुर मात्रा में लिखा हुआ है। दूसरे शब्दों में लिखा जाए तो भारत में अग्निहोत्र की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। अग्निहोत्र एक प्रकार का यज्ञ ही है। यजुर्वेद (10.8.29) के अनुसार यज्ञ के कारण मानव में स्थित चैतन्य शक्ति को ऊर्जा मिलती है तथा मानव निरोगी रहता है। हमारा जीवन, जीवनशक्ति, आँखें, कान, वाचा, मन तथा आत्मा यज्ञ की वजह से प्रबल बनें।

अग्निहोत्र को लेकर आज दुनियाभर शोध हो रहे हैं और हुए हैं जिनमें इसके वैज्ञानिक तत्व की पुष्टि हुई है। इंटरनेट के इस युग में बहुत सी वेबसाइट अग्निहोत्र की वैज्ञानिकता और महत्व पर लिख रही हैं। अग्निहोत्र संबंधी शोध और अन्य जानकारियां वैसे तो इंटरनेट पर अनेक जगह मिल जायेगी लेकिन www.agnihotra.org पर बहुत सी जानकारी एकसाथ मिल जायेगी।

वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो अग्निहोत्र तांबे (धातु) के एक पात्र में किया जाता है जिसे अग्निपात्र कहा जाता है। तांबे की विशेषता हम जानते हैं कि यह ऊर्जा अथवा ऊष्मा का सुचालक है और यह त्वरित ऊर्जा अथवा शक्तिवाहक धातु है। उसी प्रकार धातु के अलावा इसके आकार का भी महत्त्व है। अग्निपात्र का आकार उलटे पिरामिड जैसा है। इसमें तीन लहरें या छोटे विभाग होते हैं। इसके आकार के कारण ही इसमें से निकलनेवाली लहरें वातावरण में अधिक जगह व्याप्त रहती हैं। वैज्ञानिकों के अभ्यास से यह सिद्ध हुआ है कि पिरामिड के मध्य में एक उर्जास्रोत कार्यरत रहता है।

अग्निहोत्र में में जलने वाली सामग्री से अलग-अलग रासायनिक यौगिक और मिश्रण निर्मित होते हैं। और अग्निहोत्र के पात्र के आकार की वजह से उनका वातावरण में अधिक पैमाने पर फैलाव होता है तथा हवा के प्रवाह के कारण दूर तक प्रभाव होता है जिसके परिणाम स्वरुप वातावरण में एक प्रकार का सुरक्षा कवच बनता है। रासयनिक प्रक्रिया में विषैली कार्बन मोनो ऑक्साइड गैस का रूपांतर कार्बन डाइऑक्साइड में होता है, जो दिन में वनस्पति को हरित द्रव्य(क्लोरोफिल) बनाने में सहायता करता है और अंत में वातावरण शुद्धि में सहायता करता है।

साथ ही अग्निहोत्र यज्ञ में होने वाले मंत्रोच्चारण की  ध्वनि के विशिष्ट प्रकार के कंपन तैयार होते हैं, जिसका प्रभाव मनुष्य के मस्तिष्क पर होता है। जिसके परिणाम स्वरुप मनुष्य का तनाव कम होता है और सकारात्मकता बढ़ती है। अग्निहोत्र से बनने वाली भस्म शक्तिशाली औषधीय गुणों से युक्त पाई गई है। यह भस्म खेती के लिए एक सर्वोत्तम खाद के रूप में पाई गई है। यह भस्म बीजों की अंकुरण क्षमता बढ़ाती है। यह भी पाया गया है कि इस भस्म की वजह से जमीन का उपजाऊपन तथा जलधारण क्षमता काफी बढ़ जाती है।

प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हुआ है कि अग्निहोत्र पर्यावरण का प्रदूषण रोकने में सहायक है। केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के अलग-अलग देशों में अग्निहोत्र का प्रचार-प्रसार देखने में आया है।  इतना ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अग्निहोत्र पर चर्चासत्र का आयोजन किया जा रहा है।

अनेक शोधों से यह सिद्ध हो चुका है कि अग्निहोत्र से मनुष्य की एकाग्रता बढ़ती हैं, मानसिक तनाव कम होता है, मन में  वातावरण में शांति का अनुभव होता है, सकारत्मकता बढ़ती है, यदि बच्चे अग्निहोत्र करें तो उनका विकास बहुत अच्छा होता है, परिवार सामूहिक रूप से करे तो अपन्नत्व और सामंजस्य संवर्धन होता है। निर्मित सकारात्मकता से दुर्व्यसनों से मुक्त होने में सहायता मिलती है। शरीर की रोगप्रतिरक्षा शक्ति बढ़ती है।