उपवास का शाब्दिक अर्थ है, उप अर्थात् निकट और वास अर्थात् रहना। इस प्रकार उपवास का अर्थ हुआ भगवान के निकट रहना।
भारत के लोगों के साथ आज एक समस्या हो गई है कि जब तक विदेशी लोग भारतीय शोध और चीजों पर अपना ठप्पा लगाकर बाजार में नहीं उतारते तब तक हम अपने उन्नत ज्ञान और विज्ञान का महत्व नहीं समझते। कुछ ऐसा ही है व्रत और उपवास के साथ भी। हम जिसे सहस्त्राब्दियों से व्रत या उपवास कहते हैं उसे पश्चिमी वैज्ञानिक आज ऑटोफैगी कहते हैं। हम सबको जानकार आश्चर्य होगा कि जापानी कोशिका जीवविज्ञानी (वैज्ञानिक) योशिनोरी ओहसुमी ने 2016 में ऑटोफैगी प्रक्रिया पर किये अपने शोध के लिए चिकित्सा में नोबेल पुरस्कार जीता था। ऑटोफैगी प्रक्रिया में कोशिकाएं अपनी सामग्री को पुनर्चक्रित (रिसायकल) और नवीनीकृत करती हैं। उपवास ऑटोफैगी प्रक्रिया को सक्रिय करता है, जो आयु बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करने में सहायता करता है और इसे कोशिका नवीकरण पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।
ऑटोफैगी क्या है?
भूख के दौरान, कोशिकाएं प्रोटीन और अन्य कोशिका घटकों को तोड़ती हैं और ऊर्जा के लिए उनका उपयोग करती हैं। ऑटोफैगी के दौरान, कोशिकाएं वायरस और बैक्टीरिया को नष्ट करती हैं और क्षतिग्रस्त संरचनाओं से छुटकारा पाती हैं। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो कोशिका के स्वास्थ्य, नवीनीकरण और अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण है।
National Center for Biotechnology Information (NCBI) में प्रकाशित एक वैज्ञानिक शोध के अनुसार, उपवास (Intermittent Fasting) के दौरान शरीर में Autophagy की प्रक्रिया तेज़ हो जाती है, जिससे पुरानी और खराब कोशिकाएँ नष्ट होती हैं और नई स्वस्थ कोशिकाओं का निर्माण होता है। यह प्रक्रिया शरीर के डिटॉक्स और रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
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हम जानते हैं मनुष्य शरीर भी एक यंत्र की तरह है। हम जब भी भोजन करते हैं उसे पचाने में शरीर को कार्य करना पड़ता है। व्रत अथवा उपवास करने से शरीर की यांत्रिक प्रणाली अर्थात् पाचन तंत्र को आराम मिलता है और इसका पुनर्निर्माण (मरम्मत) आदि कार्य स्वतः होता है। इसके परिणाम स्वरुप हमारे पाचन-तंत्र की कार्य क्षमता बढ़ती है। उपवास से अपने इंद्रियों को वश में करने की आदत विकसित होने में मदद मिलती है, उसी प्रकार इच्छाओं पर अंकुश लगने से मानसिक शांति मिलती है।
दूसरे व्रत और उपवास आयुर्वेद का महत्त्वपूर्ण अंग है। आयुर्वेद के अनुसार शरीर में संचित हानिकारक विषैले पदार्थों के कारण ही अनेकानेक रोग होते हैं। व्रत अथवा उपवास करने से इन विषाक्त पदार्थों में कमी आती हैं। पूर्ण रूप से किया उपवास शरीर के लिए अत्यंत लाभकारी है। उपवास करने से शरीर में तनाव और वातोन्माद में कमी आती है। आधुनिक रिसर्च से यह सिद्ध हुआ है कि उपवास से अनेक रोगों जैसे मधुमेह, कैंसर और अल्जाइमर आदि पर भी नियंत्रण किया जा सकता है।
उपवास से शरीर में दुर्बलता नहीं आती है। बल्कि शरीर का शुद्धिकरण होता है और शरीर संतुलित होकर कार्य करता है। उपवास से पाचन-क्रिया होती है और शरीर के यकृत (लिवर), मूत्रपिंड (किडनी), पाचक ग्रंथि (पैनक्रेअस) जैसे अभिन्न अंगों की कार्यक्षमता संवर्धन होता है। व्रत धर्म के मार्ग पर चलने हुए शरीर शोधन की एक वैज्ञानिक पद्धति है।
व्रत अथवा उपवास करने से शारीरिक लाभ:
रक्त का शुद्धीकरण
व्रत रखने से रक्त का शुद्धीकरण होता है। आतों की सफाई भी होती है। उदर को आराम मिलता है। उत्सर्जन तंत्र और पाचन तंत्र, दोनों ही अपनी अशुद्धियों से छुटकारा पाते हैं।
रोगों से मुक्ति
व्रत कई तरह के रोगों से मुक्ति पाने का मार्ग है। इससे स्वशन प्रक्रिया भी ठीक होती है। व्रत, उपवास रखना हृदय के लिए बहुत अच्छा माना गया है। व्रत करने से कैलोस्ट्रोल स्तर को घटता है। अर्थराइटिस, अस्थमा, जैसी बीमारियों में यह लाभप्रद होता है। ऐसा वैज्ञानिक शोध बताते हैं।
संक्षिप्त में लिखा जाये तो व्रत और उपवास की वैज्ञानिकता कुछ ऐसे वर्णित की जा सकती है। भोजन बनाने के लिए उपयोग होने वाली सामग्री अर्थात् ‘अन्न’ में मादकता होती है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो इसमें भी एक प्रकार का नशा होता है। भोजन करने के तुरंत बाद हम सबने ध्यान दिया होगा कि नींद आने लगती है और आलस छा जाता है। विज्ञान की भाषा में इसे शरीर में ग्लूकोज़ स्तर बढ़ना कहते हैं।
वैज्ञानिक कहते हैं कि सप्ताह में एक दिन तो व्रत जिसे अंग्रेजी भाषा में फास्ट कहते हैं जरूर रखना ही चाहिए। इससे आमाशय, यकृत एवं पाचनतंत्र को विश्राम मिलता है तथा उसकी स्वतः ही सफाई हो जाती है। इस रासायनिक प्रक्रियाअर्थात् लुब्रिकेशन से पाचनतंत्र मजबूत हो जाता है तथा व्यक्ति की आंतरिक शक्ति के साथ-साथ उसकी आयु भी बढ़ती है।
FAQ:
Q1. क्या उपवास से सच में Autophagy बढ़ती है?
Ans. हाँ, वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि उपवास के दौरान शरीर में Autophagy की प्रक्रिया सक्रिय हो जाती है, जिससे खराब कोशिकाएँ नष्ट होती हैं।
Q2. क्या रोज़ उपवास करना सुरक्षित है?
Ans. नहीं, रोज़ लंबा उपवास करना सभी के लिए सुरक्षित नहीं होता। हफ़्ते में 1–2 बार हल्का उपवास अधिक सुरक्षित माना जाता है।
Q3. क्या व्रत-उपवास मधुमेह (Diabetes) में फायदेमंद है?
Ans. कुछ शोधों में fasting से insulin sensitivity बढ़ने की बात सामने आई है, लेकिन मधुमेह के रोगी डॉक्टर की सलाह के बिना उपवास न करें।