सोमनाथ मंदिर Bharat के इतिहास में केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि समय के साथ चलती हुई सभ्यता की आत्मकथा है। यह मंदिर जितनी बार टूटा, उतनी ही बार फिर खड़ा हुआ। गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में, अरब सागर के तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर को बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम स्थान प्राप्त है। इसका इतिहास हजारों वर्षों में फैला हुआ है, जिसमें पौराणिक युग, ऐतिहासिक आक्रमण और आधुनिक Bharat का पुनर्जागरण—all शामिल हैं।
पौराणिक काल से ऐतिहासिक युग तक
हिंदू पुराणों के अनुसार, चंद्रदेव ने अपने क्षय रोग से मुक्ति पाने के लिए Bhagwan Shiv की कठोर तपस्या की थी। Shiv की कृपा से रोगमुक्त होने के बाद चंद्रदेव ने इस स्थान पर Shivling की स्थापना की। इसी कारण इस ज्योतिर्लिंग को “सोमनाथ” कहा गया — अर्थात चंद्रमा के स्वामी के देवता।
यद्यपि पौराणिक काल की घटनाओं को वर्ष विशेष में बाँधना कठिन है, लेकिन यह स्पष्ट है कि यह स्थल वैदिक और उत्तर-वैदिक काल से ही धार्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा। गुप्त काल (लगभग 4th–6th century CE) तक सोमनाथ एक भव्य और स्थापित तीर्थ के रूप में विकसित हो चुका था।
1025 ईस्वी: महमूद ग़ज़नवी का आक्रमण
सोमनाथ मंदिर के इतिहास में सबसे निर्णायक मोड़ 1025 ईस्वी में आया, जब ग़ज़नी के शासक महमूद ग़ज़नवी ने मंदिर पर आक्रमण किया। उस समय सोमनाथ केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध था। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, मंदिर में अपार धन-संपत्ति, स्वर्ण अलंकरण और रत्न जड़े हुए थे।
ग़ज़नवी ने मंदिर को ध्वस्त किया और Shivling को खंडित किया। यह आक्रमण Bharat की सांस्कृतिक स्मृति में गहरे अंकित हो गया। किंतु इस विध्वंस के बाद भी सोमनाथ का अंत नहीं हुआ—कुछ ही वर्षों में स्थानीय हिंदू शासकों द्वारा मंदिर का पुनर्निर्माण कर दिया गया।
12वीं से 17वीं शताब्दी: बार-बार ध्वंस और पुनर्निर्माण
12वीं शताब्दी में सोलंकी राजाओं के संरक्षण में मंदिर फिर से भव्य स्वरूप में खड़ा किया गया। लेकिन 1299 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति उलुग खान ने सोमनाथ पर आक्रमण किया और मंदिर को फिर से नुकसान पहुँचाया।
17वीं शताब्दी में, मुग़ल शासक औरंगज़ेब के आदेश पर 1665 ईस्वी के आसपास मंदिर को एक बार फिर ध्वस्त किया गया और वहां मस्जिद बनवाने का प्रयास किया गया। इस समय तक सोमनाथ मंदिर Bharat के उस संघर्ष का प्रतीक बन चुका था, जिसमें आस्था और सत्ता आमने-सामने थीं।
इन सभी आक्रमणों के बावजूद, सोमनाथ कभी पूरी तरह विस्मृत नहीं हुआ। स्मृति, श्रद्धा और संकल्प के रूप में यह जीवित रहा।
1947 के बाद: स्वतंत्र Bharat और पुनर्जागरण
Bharat की स्वतंत्रता के बाद सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण केवल धार्मिक कार्य नहीं था, बल्कि यह राष्ट्रीय आत्मसम्मान का प्रश्न बन गया। सरदार वल्लभभाई पटेल ने 1947 में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। उनके अनुसार, यह कार्य गुलामी की मानसिकता से मुक्ति का प्रतीक था।
1951 में मंदिर का पुनर्निर्माण पूर्ण हुआ और उसका उद्घाटन Bharat के प्रथम राष्ट्रपति Dr. Rajendra Prasad द्वारा किया गया। उन्होंने अपने भाषण में स्पष्ट कहा कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण आस्था के साथ-साथ Bharat की ऐतिहासिक चेतना की पुनर्स्थापना है।
आज का सोमनाथ मंदिर
आज का सोमनाथ मंदिर पारंपरिक चालुक्य शैली में निर्मित है। इसका शिखर, स्वर्ण कलश और समुद्र के सामने स्थित गर्भगृह इसे विशेष बनाते हैं। प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु यहाँ दर्शन के लिए आते हैं।
सोमनाथ आज केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि यह संदेश है कि सभ्यताएँ केवल इमारतों से नहीं, बल्कि अपने विश्वास से जीवित रहती हैं।
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