व्यासपीठ राजघाट नम्होल से सिकरोहा की ओर जाने पर कुछ दूरी पर पांडव मंदिर स्थित है। पांडव मंदिर से आगे जोड़ नामक स्थान आता है, जहाँ जोड़ेश्वर महादेव का मंदिर है। जोड़ से लगभग तीन किलोमीटर आगे त्रिवेणी घाट और वहाँ से लगभग चार किलोमीटर आगे धूणी पंजैल गाँव आता है।
धूणी पंजैल में सड़क से घाटी की ओर उतरने पर, खड्ड के दूसरी ओर प्रकृति की गोद में एक सुंदर देवस्थल स्थित है। स्थानीय परंपरा के अनुसार यह स्थान जूना अखाड़ा के सिद्ध संत बाबा गंगागिरी जी की तपोस्थली रहा है। यहाँ अनेक प्राचीन मंदिर और देव-अर्च विग्रह स्थापित हैं।
इस देवस्थल की विशेष पहचान भगवान शिव के शिवलिंग स्वरूप दावींनाथ महाराज के रूप में होती है। दावींनाथ महाराज की स्थापना से संबंधित एक कथा स्थानीय क्षेत्र में प्रचलित है।
दावींनाथ महाराज की स्थापना की कथा
स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित मान्यता के अनुसार लगभग 600 वर्ष पूर्व भगवान शिव बाबा गंगागिरी के स्वप्न में प्रकट हुए। उन्होंने बाबा को बताया कि वे शिवलिंग के रूप में मार्कण्डेय नामक स्थान पर किसी खेत में दबे हुए हैं और बाबा गंगागिरी को वहाँ जाकर उस शिवलिंग को अपने साथ लाने का निर्देश दिया।
कथा के अनुसार बाबा गंगागिरी स्थानीय लोगों को साथ लेकर मार्कण्डेय पहुँचे। वहाँ खुदाई करने पर एक सुंदर शिवलिंग प्राप्त हुआ। मार्कण्डेय गाँव के लोगों ने शिवलिंग को वहाँ से ले जाने की अनुमति नहीं दी। तब बाबा गंगागिरी ने कहा कि यदि वे स्वयं शिवलिंग को उठाकर स्थापित कर दें तो ठीक है, लेकिन यदि वे उसे उठा नहीं पाए तो बाबा गंगागिरी और उनके साथी उसे अपने साथ ले जाएँगे।
स्थानीय लोगों ने शिवलिंग को उठाने के अनेक प्रयास किए, लेकिन वे सफल नहीं हुए। इसके बाद बाबा गंगागिरी और उनके साथ आए लोगों ने प्रयास किया और शिवलिंग को वहाँ से उठा लिया। इसके बाद उसे पंजैल लाया गया।
छोटे द्वार वाले मंदिर में शिवलिंग की स्थापना
पंजैल में शिवलिंग की स्थापना के लिए एक मंदिर पहले से बना हुआ था। मंदिर का प्रवेश द्वार छोटा था, जबकि शिवलिंग का आकार द्वार से बड़ा था। लोगों ने अनेक प्रयास किए, लेकिन शिवलिंग को मंदिर के भीतर ले जाने में सफल नहीं हुए।
कथा के अनुसार बाबा गंगागिरी ने लोगों से कुछ समय विश्राम करने के लिए कहा। विश्राम के बाद जब लोग वापस आए तो शिवलिंग मंदिर के भीतर स्थापित हो चुका था। स्थानीय लोग इस घटना को बाबा गंगागिरी की सिद्धि से जोड़कर देखते हैं।
प्राचीन मंदिर और देव विग्रह
मुख्य मंदिर के साथ दो अन्य मंदिर भी स्थित हैं, जिनमें समाधियाँ और शिवलिंग स्थापित हैं। परिसर में भगवान शंकर और माता गौरी का एक मंदिर भी है, जिसे गौरी शंकर मंदिर कहा जाता है। इसमें स्थापित भगवान शंकर और माता गौरी की मूर्तियाँ अत्यंत प्राचीन प्रतीत होती हैं।
इसके अतिरिक्त यहाँ माँ दुर्गा का मंदिर भी है तथा पवनपुत्र हनुमान जी की प्रतिमा भी स्थापित है।
स्थानीय परंपरा के अनुसार यहाँ स्थित प्राचीन मंदिरों और सरायों का निर्माण ब्यासपुर, जो बिलासपुर का पुराना नाम बताया जाता है, के राजा द्वारा कराया गया था। इनकी निर्माण शैली सतलुज नदी में जलमग्न हुए मंदिरों की स्थापत्य शैली से मिलती-जुलती बताई जाती है।
बाबा गंगागिरी की समाधि और धूणा
इसी स्थान पर बाद में बाबा गंगागिरी ने समाधि ली। स्थानीय मान्यता के अनुसार बाबा गंगागिरी का धूणा लगभग 600 वर्षों से निरंतर चेतन है। इसी चेतन धूणे के कारण इस गाँव का नाम धूणी पंजैल पड़ा माना जाता है।
वर्तमान समय में इस पवित्र स्थल की देखरेख बाबा सिद्धपूरी नामक युवा साधु कर रहे हैं। यहाँ प्रत्येक वर्ष महाशिवपुराण का आयोजन किया जाता है। बाबा सिद्धपूरी के प्रयासों से इसी परिसर में एक और भव्य मंदिर के निर्माण का कार्य भी चल रहा है।
आस्था और स्थानीय परंपरा
धूणी पंजैल केवल एक मंदिर परिसर नहीं, बल्कि स्थानीय धार्मिक परंपरा, साधु-संतों की तपस्या और शिवोपासना से जुड़ा हुआ आस्था-स्थल है। बाबा गंगागिरी की तपोस्थली, दावींनाथ महाराज की आराधना, प्राचीन मंदिर, समाधियाँ और अखंड धूणे की परंपरा इस स्थान को विशिष्ट धार्मिक पहचान प्रदान करती है।
संदर्भ
यह लेख नम्होल निवासी इंजी लेखराम कौंडल द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी पर आधारित है।



- जोड़ेश्वर महादेव, गाँव साई, नम्होल, बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश - October 8, 2026
- स्व. उषा ठाकुर, गाँव बंदला, जिला बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश - October 8, 2026
- त्रिवेणी घाट, नम्होल, बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश - October 7, 2026