भारत विविधताओं से भरा देश है। यहाँ अनेक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियाँ समय-समय पर सामने आती रही हैं। नक्सलवाद भी ऐसी ही एक गंभीर चुनौती रही है, जिसने देश की आंतरिक सुरक्षा, विकास और सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित किया है। इसी महत्वपूर्ण विषय को केंद्र में रखकर तुहिन सिन्हा और आलोक कुमार द्विवेदी ने “नक्सल-मुक्त भारत” पुस्तक का लेखन किया है। यह पुस्तक नक्सलवाद की पृष्ठभूमि, उसके विस्तार, उसके प्रभाव और उससे निपटने के प्रयासों पर विस्तार से विचार करती है।
पुस्तक में नक्सलवाद के उद्भव और उसके विकास को समझाने का प्रयास किया गया है। लेखक बताते हैं कि किस प्रकार नक्सली विचारधारा ने धीरे-धीरे देश के कुछ पिछड़े और आदिवासी क्षेत्रों में अपनी पकड़ बनाई। नक्सलवाद के कारण उत्पन्न हिंसा और अस्थिरता का सबसे अधिक प्रभाव आम जनता तथा सुरक्षा बलों पर पड़ा है। पुस्तक इस समस्या के विभिन्न पहलुओं को सामने लाते हुए इसे केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न न मानकर राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास से जुड़ा विषय मानती है।
लेखकों के अनुसार, नक्सलवाद से मुकाबला केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई से संभव नहीं है। इसके लिए प्रभावित क्षेत्रों में विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क और अन्य आधारभूत सुविधाओं का विस्तार भी आवश्यक है। जब लोगों को बेहतर अवसर और शासन-व्यवस्था पर विश्वास मिलता है, तब हिंसक विचारधाराओं के प्रभाव को कम करना आसान होता है। इस दृष्टि से पुस्तक सुरक्षा और विकास के बीच संतुलन की आवश्यकता पर बल देती है। पुस्तक का प्रमुख उद्देश्य नक्सलवाद की चुनौती के प्रति पाठकों को जागरूक करना है। लेखक राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए आंतरिक सुरक्षा को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं। उनके विचार में हिंसा और सशस्त्र संघर्ष किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए गंभीर खतरा हैं।
साथ ही, पुस्तक यह संकेत देती है कि किसी भी क्षेत्र में स्थायी शांति केवल बल प्रयोग से स्थापित नहीं की जा सकती। इसके लिए स्थानीय लोगों का विश्वास जीतना, प्रशासन को प्रभावी बनाना और विकास की प्रक्रिया को अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाना आवश्यक है। इस प्रकार पुस्तक नक्सलवाद की समस्या के समाधान में सुरक्षा के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक विकास की भूमिका को भी महत्वपूर्ण मानती है। पुस्तक की भाषा सरल, स्पष्ट और प्रभावशाली है। विषय राजनीतिक और सुरक्षा से संबंधित होने के बावजूद लेखक इसे सामान्य पाठक के लिए समझने योग्य ढंग से प्रस्तुत करते हैं। पुस्तक की शैली तथ्यात्मक होने के साथ-साथ विचारोत्तेजक भी है। पाठक को केवल घटनाओं की जानकारी नहीं मिलती, बल्कि वह नक्सलवाद के कारणों और उसके परिणामों के बारे में सोचने के लिए भी प्रेरित होता है।
नक्सलवाद एक जटिल समस्या है और इसे समझने के लिए विभिन्न दृष्टिकोणों पर विचार करना आवश्यक है। आदिवासी समुदायों की समस्याएँ, गरीबी, विस्थापन, भूमि एवं वन अधिकार और स्थानीय असंतोष जैसे विषय भी इस समस्या को समझने में महत्वपूर्ण हैं। इसलिए पाठक के लिए यह उपयोगी होगा कि वह पुस्तक में दिए गए दृष्टिकोण के साथ-साथ अन्य स्वतंत्र अध्ययनों और विचारों को भी पढ़े। इससे विषय की अधिक संतुलित समझ विकसित हो सकती है। अंततः, नक्सल-मुक्त भारत नक्सलवाद और भारत की आंतरिक सुरक्षा से संबंधित एक महत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक पुस्तक है। यह पुस्तक पाठक को नक्सलवाद की समस्या, उसके प्रभाव और उसके समाधान के विभिन्न पहलुओं पर विचार करने का अवसर देती है। पुस्तक से यह संदेश मिलता है कि स्थायी शांति के लिए केवल सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करना पर्याप्त नहीं है; इसके साथ विकास, सुशासन, शिक्षा, रोजगार और जनता का विश्वास भी आवश्यक है। मेरे विचार से यह पुस्तक उन विद्यार्थियों और पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो भारतीय राजनीति, आंतरिक सुरक्षा, सामाजिक समस्याओं और राष्ट्र निर्माण जैसे विषयों में रुचि रखते हैं। पुस्तक पढ़ने के बाद नक्सलवाद को केवल हिंसा की समस्या के रूप में नहीं, बल्कि सुरक्षा, विकास और शासन से जुड़े व्यापक प्रश्न के रूप में समझने का अवसर मिलता है।
- नक्सल-मुक्त भारत पुस्तक समीक्षा - October 7, 2026