जब-जब कोई समाज अपने इतिहास, संस्कार और उत्तरदायित्व को भूलने लगता है, तब-तब उस पर संकट गहराने लगता है और यह सत्य भारत के इतिहास ने बार-बार प्रमाणित किया है। इसी ऐतिहासिक यथार्थ को स्मरण में लाने और भविष्य के लिए चेतना जगाने का संकल्प लिया है समाजसेवी, लेखिका और उद्यमी मीनाक्षी शरण ने, जिन्हें देशभर में लोग स्नेहपूर्वक “दीदी” और “माता” के रूप में जानते हैं।
मीनाक्षी शरण अयोध्या फाउंडेशन की संस्थापक हैं और विगत दो दशकों से भारतीय कला, संस्कृति और सनातन परंपराओं के पुनर्जागरण के लिए निरंतर कार्यरत हैं। संभवतः वे आधुनिक भारत की उन विरल आवाज़ों में से एक हैं, जिन्होंने 1947 के विभाजन की वास्तविकता, उसमें हुए हिंदू नरसंहार और उससे जुड़ी ऐतिहासिक पीड़ा पर लगातार, स्पष्ट और बिना किसी लाग-लपेट के लिखना और बोलना जारी रखा। ऐसे समय में, जब विभाजन का सच या तो दबा दिया गया या चयनात्मक स्मृति के हवाले कर दिया गया, मीनाक्षी शरण ने इस मौन को तोड़ने का साहस किया।
भारत का इतिहास केवल वैभव, ज्ञान और दर्शन का इतिहास नहीं रहा, बल्कि वह संघर्ष, बलिदान और निरंतर आक्रमणों का भी इतिहास है। सातवीं शताब्दी से लेकर 1947 के विभाजन तक, असंख्य हिंदुओं ने केवल अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के कारण अपने प्राण गंवाए। विभाजन के दौरान हुई भयावह हिंसा में अनगिनत परिवार समाप्त हो गए, पीढ़ियाँ उजड़ गईं। किंतु विडंबना यह रही कि उन करोड़ों हिंदू आत्माओं के लिए समाज स्तर पर कभी विधिवत श्राद्ध, तर्पण और स्मरण का प्रयास नहीं हुआ।
इस ऐतिहासिक उपेक्षा के पीछे एक बड़ा कारण वह इतिहास लेखन भी रहा, जिसमें वामपंथी दृष्टिकोण हावी रहा और हिंदू समाज के दुख, पीड़ा और बलिदान को या तो नकार दिया गया या विकृत रूप में प्रस्तुत किया गया। दूसरी ओर, जो स्वयं को राष्ट्रवादी या दक्षिणपंथी कहते रहे, वे भी लंबे समय तक इस विषय पर मौन साधे रहे। परिणामस्वरूप हिंदू समाज अपने ही इतिहास से कटता चला गया।
इसी ऐतिहासिक शून्य को भरने का प्रयास मीनाक्षी शरण ने “सामूहिक तर्पण अभियान” के माध्यम से किया। पिछले एक दशक से वे उन असंख्य हिंदू आत्माओं के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धांजलि अर्पित करने के उद्देश्य से यह अभियान चला रही हैं, जिनका कभी किसी ने श्राद्ध नहीं किया। इस पहल के माध्यम से प्रतिवर्ष देश-विदेश के लाखों हिंदू अपने सच्चे इतिहास और धार्मिक कर्तव्यों से परिचित हो रहे हैं और अपने-अपने स्थानों पर सामूहिक तर्पण का आयोजन कर रहे हैं।
वर्ष 2020–21 में उन्होंने 15 अगस्त को “श्राद्ध संकल्प दिवस” के रूप में मनाने का सार्वजनिक आह्वान किया। यह पहल केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं थी, बल्कि सामूहिक स्मृति, कर्तव्य और आत्मबोध का प्रयास थी, उन हिंदुओं के लिए, जिनका इतिहास में नाम तक दर्ज नहीं हुआ। कोरोना काल की कठिन परिस्थितियों में भी, सभी प्रोटोकॉल का पालन करते हुए, इन्होने नर्मदा के तट पर सामूहिक तर्पण का विधिवत आयोजन किया गया। यह क्षण ऐतिहासिक था, जब समाज ने संगठित रूप से अपनी भूली-बिसरी आत्माओं के प्रति उत्तरदायित्व स्वीकार किया।
मीनाक्षी शरण का यह विचार कि बिना स्मरण और तर्पण के असंख्य आत्माएँ भटकती रहती हैं, धीरे-धीरे राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनने लगा। इस चिंतन को एक प्रकार की औपचारिक मान्यता तब मिली, जब भारत सरकार द्वारा 14 अगस्त को “विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस” घोषित किया गया। यह घोषणा इस बात का संकेत थी कि अब राष्ट्र स्तर पर भी विभाजन की पीड़ा को स्वीकार किया जा रहा है।
प्रतिवर्ष को सर्वपितृ अमावस्या के दिन, वह अपने परिवार सहित हरिद्वार के हर की पौड़ी पर उन असंख्य हिंदू आत्माओं की शांति के लिए सामूहिक तर्पण और विधिवत पूजा का आयोजन करती है। यह आयोजन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक चेतना का प्रतीक बन गया है। देश के विभिन्न राज्यों से अनेक प्रमुख विचारक, सामाजिक कार्यकर्ता और हिंदू संगठनों के प्रतिनिधि इसमें सम्मिलित होते हैं।
मीनाक्षी शरण भारत के प्राचीन ज्ञान, इतिहास और संस्कृति पर सतत शोध करती आई हैं और उसे आधुनिक भारतीय समाज में पुनर्स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इसी वैचारिक यात्रा का विस्तार उनकी आगामी पुस्तक Paid in Blood में देखने को मिलेगा, जो हिंदू समाज के बलिदानों और ऐतिहासिक सच्चाइयों पर केंद्रित है।
हिंदू समाज के प्रति उनके निस्वार्थ सांस्कृतिक योगदान के लिए 12 दिसंबर 2025 को उन्हें पीठाधीश्वर शंकराचार्य श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज द्वारा “देवी दुर्गा सम्मान” से अलंकृत किया गया। यह सम्मान न केवल उनके कार्यों की मान्यता है, बल्कि उस चेतना का भी स्वीकार है, जिसे वे वर्षों से जाग्रत करने का प्रयास कर रही हैं।
निस्संदेह, मीनाक्षी शरण का कार्य केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि भविष्य के लिए चेतावनी और दिशा दोनों है। उनकी पहल यह सिखाती है कि स्मृति, कृतज्ञता और संस्कार ही किसी सभ्यता की वास्तविक शक्ति होते हैं और जब तक समाज अपने इतिहास को निष्ठापूर्वक स्वीकार नहीं करता, तब तक उसका आत्मबोध अधूरा ही रहता है।
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