“वैदिक सनातन हिन्दुत्व” – मनोज सिंह की संवेदनशील, तर्कपूर्ण और शोधपूर्ण प्रस्तुति

मनोज सिंह जी द्वारा लिखित और प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक “वैदिक सनातन हिन्दुत्व” आज के समय की उन अत्यंत आवश्यक कृतियों में से एक है, जो सनातन धर्म को केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और वैचारिक आयामों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ पुनः स्पष्ट करती है। आधुनिक भारत में ‘हिन्दुत्व’ शब्द को लेकर होने वाली वैचारिक बहसों के बीच यह पुस्तक एक संतुलित, गहन और प्रमाणिक आवाज प्रदान करती है, जो पाठकों को भ्रमित करने के बजाय स्पष्ट दृष्टि प्रदान करती है।

मनोज सिंह जी का लेखन शैली सरल, सहज और सटीक है। वे न तो अतिरंजना करते हैं और न ही विचारों को थोपने की कोशिश। इसके बजाय, वे वैदिक ग्रंथों, इतिहास, पुरातात्त्विक प्रमाणों और तर्कपूर्ण विश्लेषण के आधार पर बताते हैं कि सनातन हिन्दुत्व वास्तव में क्या है और यह भारत की आत्मा से किस प्रकार जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि यह पुस्तक केवल धार्मिक रुचि रखने वाले पाठकों के लिए ही नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास, संस्कृति, समाज और दर्शन को समझने वालों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाती है।


इस पुस्तक का मुख्य संदेश यह है कि “हिन्दुत्व” किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा का नाम नहीं, बल्कि एक प्राचीन वैदिक जीवनदर्शन है, जो हजारों वर्षों से भारत की चेतना का आधार रहा है। मनोज सिंह जी स्पष्ट करते हैं कि ‘हिन्दू’ शब्द भले ही समय के साथ विकसित हुआ हो, किंतु सनातन धर्म का अस्तित्व अनादि और अनन्त है। यह धर्म किसी एक पैगंबर, एक ग्रंथ या एक ऐतिहासिक घटना पर आधारित नहीं; यह एक सतत विकसित होने वाला जीवन-मूल्य है जो मनुष्य को प्रकृति, समाज और परम सत्य से जोड़ता है।

लेखक यह भी बताते हैं कि हिंदुत्व केवल पूजा-पद्धतियों तक सीमित नहीं है। यह आचार-विचार, व्यवहार, संस्कृति, जीवनशैली, पर्यावरण सम्मान, वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना और आत्मानुशासन की संपूर्ण परंपरा है। इसी दृष्टि से यह पुस्तक आधुनिक युवाओं के लिए विशेष उपयोगी है, क्योंकि यह उन्हें सनातन धर्म की वैज्ञानिक और तार्किक जड़ों से जोड़ती है।

पुस्तक का ढांचा अत्यंत सुव्यवस्थित है। लेखक ने विषय को कई व्यापक अध्यायों में विभाजित किया है, जिनमें शामिल हैं—

  • वैदिक संस्कृति की उत्पत्ति और विशेषताएँ
  • सनातन हिन्दुत्व की दार्शनिक नींव
  • प्राचीन ऋषियों द्वारा विकसित वैज्ञानिक परंपराएँ
  • हिन्दुत्व के सामाजिक और नैतिक मूल्य
  • इतिहास के माध्यम से हिन्दू समाज का आत्मबल
  • विदेशी आक्रमणों में भी सनातन धर्म की निरंतरता
  • आधुनिक काल में हिन्दुत्व पर प्रश्न और उनकी वास्तविकता

प्रत्येक अध्याय में लेखक प्राथमिक स्रोतों—वेद, उपनिषद, पुराण, स्मृति-ग्रंथ, महाभारत, रामायण—के साथ-साथ आधुनिक शोधों का भी संदर्भ देते हैं, जो इसे एक संतुलित और शोधपूर्ण पुस्तक बनाता है।

इस पुस्तक की सबसे विशेष बात यह है कि यह हिन्दुत्व को किसी अंधविश्वास या अतीत-भक्ति के रूप में प्रस्तुत नहीं करती। इसमें बताया गया है कि—

  • वैदिक ऋषियों ने खगोलशास्त्र, गणित, चिकित्सा, योग, आयुर्वेद जैसे क्षेत्रों में अद्भुत ज्ञान विकसित किया था।
  • प्रकृति के साथ संतुलन, पंचमहाभूत, अग्निहोत्र, पर्यावरण-रक्षा आदि वैदिक सिद्धांत आज के आधुनिक पर्यावरण-विज्ञान का आधार बनते हैं।
  • सनातन हिन्दुत्व पूरी तरह तर्क, अनुभव और विज्ञान पर आधारित जीवनशैली है, जो अंधानुकरण के बजाय निरीक्षण और चिंतन पर बल देता है।

मनोज सिंह बताते हैं कि हिन्दुत्व की इस वैज्ञानिकता को कमज़ोर करने का प्रयास कई शताब्दियों तक हुआ, लेकिन बावजूद इसके सनातन धर्म की मूल आत्मा अक्षुण्ण रही।

यह पुस्तक हिन्दुत्व को केवल आध्यात्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी गहराई से समझाती है। लेखक विशेष रूप से यह बताते हैं कि—

  • हिन्दुत्व “विविधता में एकता” का दर्शन है।
  • इसमें मतभेद स्वीकार्य हैं, क्योंकि सत्य की ओर जाने वाले मार्ग अनेक हैं।
  • हिन्दुत्व किसी पर अपने विचार थोपता नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व और करुणा पर आधारित है।
  • यह मानव मात्र के उत्थान का मार्ग बताता है, न कि केवल किसी एक समुदाय का।

आज के ध्रुवीकृत समाज में यह संदेश विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है।

आधुनिक दौर में “हिन्दुत्व” शब्द विवादों के केंद्र में रहता है। इस संदर्भ में मनोज सिंह जी अत्यंत संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हैं। वे बताते हैं कि—

  • कई आलोचनाएँ गलतफहमियों पर आधारित हैं।
  • हिंदुत्व को राजनैतिक चश्मे से देखने से उसकी मूल दार्शनिकता छिप जाती है।
  • सनातन धर्म हिंसा नहीं, बल्कि धर्म, नियम, करुणा और न्याय पर आधारित है।
  • सामाजिक सुधार सदैव हिन्दुत्व की परंपरा का हिस्सा रहे हैं—चाहे वह बुद्ध का आगमन हो, गुरुनानक की वाणी, या आधुनिक संतों के प्रयास।

पुस्तक साफ करती है कि वैदिक सनातन हिन्दुत्व एक सकारात्मक, जीवनदायी और वैज्ञानिक विचारधारा है, जो न किसी से द्वेष करती है, न किसी पर प्रभुत्व चाहती है।

यह पुस्तक उन सभी लोगों के लिए अनिवार्य है जो—

  • भारत की मूल सांस्कृतिक जड़ों को समझना चाहते हैं,
  • हिन्दुत्व की वास्तविक परिभाषा जानना चाहते हैं,
  • सनातन धर्म के वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण आधार को जानना चाहते हैं,
  • इतिहास के माध्यम से भारत की आत्मा को महसूस करना चाहते हैं।

मनोज सिंह जी की भाषा सरल है, पर विचार गहरे हैं। पुस्तक पढ़ते हुए पाठक महसूस करता है कि वह केवल इतिहास नहीं पढ़ रहा, बल्कि अपनी सांस्कृतिक स्मृति से पुनः जुड़ रहा है।


“वैदिक सनातन हिन्दुत्व” केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि आत्म-परिचय का एक दर्पण है। यह आधुनिक भारत के युवक-युवतियों के लिए विशेष महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उन्हें बताती है कि उनका धर्म केवल पूजा-पद्धतियों का समूह नहीं, बल्कि एक व्यापक, वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और मानवीय जीवनदर्शन है। मनोज सिंह जी ने अत्यंत संतुलित, प्रमाणिक और प्रेरणादायक तरीके से सनातन हिन्दुत्व की वास्तविक परिभाषा प्रस्तुत की है।

इस पुस्तक को पढ़कर पाठक समझता है कि सनातन हिन्दुत्व न कभी पुराना पड़ सकता है और न कभी समाप्त हो सकता है। यह उसी प्रकाश की तरह है जो युगों से जल रहा है—समय बदला, परिस्थितियाँ बदलीं, लेकिन सत्य, धर्म और ज्ञान का यह दीपक आज भी उतना ही उज्ज्वल है।