महर्षि वाल्मीकि:  सामाजिक समरसता के शाश्वत प्रेरणा स्रोत

महर्षि वाल्मीकि जयंती हमें अपने सामाजिक दायित्वों पर विचार करने का अवसर प्रदान करती है। यह पर्व तभी सार्थक होगा, जब हम उनके जीवन और साहित्य से प्रेरणा लेकर अपने आचरण में सकारात्मक परिवर्तन लाएँ।

भारतीय सनातन संस्कृति की समृद्ध ज्ञान परंपरा में ऐसे अनेक संत हुए जिन्होंने अपनी आध्यात्मिक और सांसारिक शिक्षाओं के माध्यम से एक समरस समाज के निर्माण के लिए कार्य किए। इन सब में महर्षि वाल्मीकि का स्थान अत्यंत विशिष्ट एवं गौरवपूर्ण है। भगवान महर्षि वाल्मीकि का जीवन और कृतित्व समाज को समरसता, सद्भाव और मानवीय गरिमा का संदेश देता है। उन्होंने रामायण जैसे महान महाकाव्य की रचना करके भारतीय समाज को आदर्श जीवन, मर्यादा, कर्तव्य और लोककल्याण की प्रेरणा प्रदान की। इस महाकाव्य में भगवान श्रीराम जी के आदर्श चरित्र, नीति, धर्म और मानवता के आदर्शों का चित्रण किया गया है।

भगवान वाल्मीकि के विचार आज भी भारतीय समाज के लिए प्रेरक बने हुए हैं। साहित्य के साथ-साथ सामाजिक पुनरुत्थान, सामाजिक समरसता और जीवन मूल्यों के प्रचार में उनका योगदान अविस्मरणीय है। उन्होंने अपने जीवन और साहित्य के माध्यम से समाज को समानता, करुणा, न्याय और मानवता का अमर संदेश दिया। उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने कि हजारों वर्ष पहले थे। उनके आदर्श हमें आज भी प्रेरणा देते हैं कि जीवन की असली शक्ति केवल आर्थिक समृद्धि में ना होकर समाज के प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार, अवसर एवं सम्मान देने में निहित है।

सामाजिक समरसता का अर्थ केवल समाज के विभिन्न वर्गों का साथ रहना नहीं है अपितु प्रत्येक व्यक्ति के प्रति सम्मान, संवेदना और आत्मीयता का भाव रखना है। वर्तमान परिदृश्य में समाज में अनेक प्रकार की विघटनकारी शक्तियां समाज को अनेक प्रकार के विभेदों में तोड़ने के लिए सक्रिय हैं। ऐसी परिस्थितियों में हमें भगवान वाल्मीकि द्वारा प्रदर्शित आदर्शों पर चलते हुए एक सभ्य, समरस और संगठित समाज के निर्माण की ओर प्रयासरत रहना पड़ेगा।

विजयदशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत जी ने कहा था, ” प्रत्येक भारतीय के लिए सद्भावना पूर्ण व्यवहार आवश्यक है। यह केवल एक विचार नहीं है। हम सभी के आचरण में यह भाव प्रकट होना चाहिए। परस्पर व्यवहार में मन-वचन-कर्म में सद्भावना और अपनापन होना चाहिए और दिखना चाहिए। छोटी-छोटी बातों पर हमें उकसा कर झगड़े करने कराने वाले लोगों से दूर रहना चाहिए।” आज जब हम भगवान वाल्मीकि जी के जीवन का स्मरण करते हैं तो हमें यह भी देखना चाहिए कि उनके आदर्शों को हम अपने दैनिक जीवन में कितना अपना रहे हैं या अपने आचरण में कितना उतार पाए हैं। क्या हम समाज के वंचित वर्गों या समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को समान अधिकार दे पा रहे हैं?  क्या हम समाज में जाति आधारित भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास करते हैं? क्या हम भेदभाव या विरोध के स्थान पर सहयोग और संवेदना को स्थान दे पा रहे हैं?

भगवान वाल्मीकि जी ने एक ऐसे समाज की परिकल्पना की थी जहां हर व्यक्ति को समान अवसर मिले हर विचार को सम्मान मिले और समाज के हर वर्ग को गरिमा प्राप्त हो। उनके द्वारा रचित रामायण में प्रत्येक प्रसंग हमें प्रेरणा देता है कि समाज तभी सशक्त और प्रगतिशील हो सकता है जब उसमें न्याय, सहिष्णुता और समरसता हो। भगवान श्रीराम और निषादराज गुह की मित्रता सामाजिक आत्मीयता और विश्वास का सुंदर उदाहरण है। इसी प्रकार शबरी प्रसंग भक्ति, श्रद्धा और समर्पण की भावना को सामने लाता है। जटायु के प्रति भगवान श्रीराम जी का व्यवहार भी करुणा और कृतज्ञता का प्रेरक उदाहरण है। इन सभी प्रसंगों को केवल धार्मिक महत्व से ना देखते हुए इनमें निहित सामाजिक संदेशों को वर्तमान जीवन में उतारना भी आवश्यक है। जब समाज व्यक्ति की पहचान को जन्म, वर्ग, जाति या  आर्थिक स्थिति से ना जोड़ कर उसके गुण, कर्म और मानवता के व्यवहार के आधार पर स्वीकार करेगा, तभी वास्तविक समरसता स्थापित होगी।

भगवान श्री राम जी  के पास अनेकानेक सुख-सुविधाओं के साधन उपलब्ध थे। अनेक राजा-महाराजा उनका साथ देने के लिए तैयार थे। परंतु तब भी भगवान श्रीराम ने समाज के वंचित, गरीव, वनवासी और परित्यक्त लोगों को साथ लिया, उनसे प्रेम किया। यही कारण है कि जब श्री राम जी  वनवास  को निकले तो केवल राजा थे और जब वापस अयोध्या लौटे तो मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहलाए। यह एक ऐसी प्रेरणा है कि व्यक्ति यदि समाज के प्रत्येक वर्ग के साथ धर्म, कर्तव्य, सत्य, न्याय और मर्यादा के साथ-साथ लोक कल्याण से जुड़ता है तो वह नारायण रूप हो जाता है। अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर समाज की स्थिरता और प्रगति के लिए सर्वस्व समर्पण की भावना से जीवन जीने की प्रेरणा मिलती है।

महर्षि वाल्मीकि जयंती हमें अपने सामाजिक दायित्वों पर विचार करने का अवसर प्रदान करती है। यह पर्व तभी सार्थक होगा, जब हम उनके जीवन और साहित्य से प्रेरणा लेकर अपने आचरण में सकारात्मक परिवर्तन लाएँ। राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता में निहित एकता, नागरिकों के पारस्परिक विश्वास और समाज के प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा में होती है। जिस समाज में सभी को आगे बढ़ने का अवसर मिलता है, वहाँ प्रतिभा का विकास होता है, सहयोग की भावना मजबूत होती है और राष्ट्रीय जीवन अधिक समृद्ध बनता है।

महर्षि वाल्मीकि का जीवन और रामायण का संदेश हमें इसी दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। उनके आदर्शों से प्रेरित होकर हमें ऐसा समाज बनाने का संकल्प लेना चाहिए, जहाँ किसी व्यक्ति के साथ जन्म अथवा सामाजिक स्थिति के आधार पर भेदभाव न हो, प्रत्येक व्यक्ति को समान अवसर प्राप्त हों और सेवा तथा संवेदना सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग बनें। आइए, महर्षि वाल्मीकि जयंती पर हम संकल्प लें कि किसी मनुष्य को छोटा-बड़ा मानने के बजाय प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा का सम्मान करेंगे। भेदभाव के स्थान पर सहयोग, उपेक्षा के स्थान पर संवेदना और सामाजिक दूरी के स्थान पर आत्मीयता को अपनाएँगे। महर्षि वाल्मीकि के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही है कि उनके ज्ञान, करुणा और मानवीय मूल्यों से प्रेरणा लेकर हम सामाजिक समरसता को अपने व्यवहार का आधार बनाएँ और एक ऐसे भारत के निर्माण में योगदान दें, जहाँ समानता केवल विचार न होकर जीवन का सत्य बने।

Dr Avnish Kumar