संघ शताब्दी यात्रा: शाखा से समाज तक

संघ की सौ वर्ष की यात्रा अनेक उतार-चढ़ावों, प्रतिबंधों और विभिन्न चुनौतियों से होकर गुजरी है। इसके बावजूद संघ अपने ध्येय से पीछे नहीं हटा और समाज सेवा के कार्यों में सक्रिय रहा।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना के 101वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में संघ ने बड़े-बड़े कार्यक्रमों के स्थान पर छोटे-छोटे कार्यक्रमों की योजना बनाकर समाज तक अपनी व्यापक पहुंच बढ़ाने का कार्य किया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में विजयादशमी के दिन डॉ. केशवराव बलिराव  हेडगेवार द्वारा नागपुर में की गई थी। स्थापना के समय से ही संघ का उद्देश्य समाज को संगठित करना और उसमें आत्मगौरव का बोध बढ़ाना रहा है। ऐसा समाज सदैव राष्ट्र के प्रति समर्पित रहकर उसके विकास में सहयोग करता है। हमारे सामने ऐसे अनेक ऐतिहासिक उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि जिन देशों के नागरिक राष्ट्र के प्रति समर्पित होते हैं, वे देश उन्नति के पथ पर अग्रसर रहते हैं। संघ भी सामाजिक परिवर्तन के इसी उद्देश्य को लेकर सतत कार्यरत रहा है और आज अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूर्ण कर चुका है।

व्यक्ति के विचारों में व्यक्तिगत स्वार्थ को किनारे रखकर राष्ट्र प्रथम का भाव जागृत करने का कार्य शाखा के माध्यम से शुरू हुआ। राष्ट्र का निर्माण उसके नागरिकों से होता है। देश के नागरिकों का जैसा चरित्र होगा, राष्ट्र का स्वरूप भी वैसा ही बनेगा। इसलिए शाखा के माध्यम से व्यक्ति के भीतर संस्कारों का जागरण किया जाता है। इससे परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति उसके चिंतन का दृष्टिकोण बदलता है। शाखा में तैयार हुआ स्वयंसेवक अपने सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में इन संस्कारों को व्यवहार में उतारकर उदाहरण प्रस्तुत करता है।

जैसे-जैसे संघ का स्वरूप बढ़ा, वैसे-वैसे स्वयंसेवकों की प्रेरणा से विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों में अनेक संगठनों की स्थापना हुई। संघ की प्रेरणा से ये संगठन शिक्षा, खेल, सेवा बस्तियों, कृषि, गौसेवा, महिला सशक्तीकरण, पर्यावरण तथा वनवासी कल्याण जैसे विविध क्षेत्रों में स्वायत्त रूप से सक्रिय हैं। शिक्षा के क्षेत्र में विद्या भारती संगठन पूरे भारत में कार्य कर रहा है। देशभर में विद्या भारती के अनेक विद्यालय संचालित हैं, जहां विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ-साथ संस्कार भी दिए जाते हैं। इन विद्यालयों में आधुनिक शिक्षा के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुरूप शिक्षा प्रदान करने पर भी बल दिया जाता है। इसी प्रकार सेवा के क्षेत्र में सेवा भारती संगठन कार्यरत है। आपदा और संकट की परिस्थितियों में जरूरतमंद लोगों की सहायता करना तथा समाज के वंचित वर्गों तक पहुंचना इन सेवा प्रयासों का महत्वपूर्ण पक्ष है। इसी प्रकार विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय संगठनों के माध्यम से संघ की प्रेरणा से समाज सेवा के कार्य किए जा रहे हैं। इन संगठनों की गतिविधियों के माध्यम से शिक्षा, सेवा, सामाजिक जागरण और जनकल्याण के प्रयासों को व्यापक स्वरूप मिला है।

संघ की सौ वर्ष की यात्रा अनेक उतार-चढ़ावों, प्रतिबंधों और विभिन्न चुनौतियों से होकर गुजरी है। इसके बावजूद संघ अपने ध्येय से पीछे नहीं हटा और समाज सेवा के कार्यों में सक्रिय रहा। यही कारण है कि आज समाज में संघ की व्यापक पहचान है। लोग संघ को जानते हैं, उसके विचारों को समझते हैं और उससे जुड़ने की इच्छा भी रखते हैं। विशेषकर युवा पीढ़ी के बीच संघ की स्वीकार्यता में उल्लेखनीय वृद्धि दिखाई देती है। संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भगवत जी ने विजयदशमी के दिन अपने उद्वोधन में कहा कि शताब्दी के निमित्त संघ की शाखाओं व स्वयंसेवकों के संपर्क के विस्तार के लिए कार्यक्रम किये गए। देश में तथा विश्व में भी भारत, हिन्दू व संघ के बारे में व्यापक प्रबोधन की योजना को भी क्रियान्वित किया गया। आंकड़ों के अनुसार  — संपर्क अभियान –  4,61,527 ग्रामों एवं 41,076 नगरीय बस्तियों में 10,19,88,511 घरों में संपर्क किया गया। प्रबुद्ध नागरिक गोष्ठी –1,117 जिलों में हुई गोष्ठियों में 4,26,497 नागरिक (महिला + पुरुष) उपस्थित रहे। सद्भावना बैठक – 5,036 खण्डों में संपन्न हुई। हिन्दू सम्मलेन – 34,187 मंडलों में सम्पन्न हुए। युवा सम्मेलनों में 39,25,225 युवा उपथित रहे। संघ के कुछ कार्यकर्ताओं के प्रवास पश्चिम के तथाकथित विकसित देशों में भी वहां के समाजों में भारत, हिन्दुत्व तथा संघ के बारे में सही जानकारी देने की दृष्टि से हुए। वहां भी हमारी सनातन, सर्वसद्भावी भारतीय संस्कृति, हिन्दू समाज की सर्वसमावेशकता, तथा संघ के उद्देश्य व कार्य की सही व सत्य जानकारी सब के सम्मुख रखी गयी। विश्व में भारत के प्रति एक कौतूहल जाग रहा है। जड़वाद, व्यक्तिवाद तथा संयम रहित उपभोग पर आधारित अधूरी दृष्टि के कारण भौतिक दृष्टि से सम्पन्न होते हुए भी वे देश चिंता में हैं।

हिमाचल प्रदेश की बात करें तो यहां संघ कार्य का विस्तार भी एक महत्वपूर्ण यात्रा रही है। उपलब्ध स्थानीय विवरणों के अनुसार, प्रदेश में संघ कार्य की शुरुआत वर्ष 1938 में हुई। इसके बाद वर्ष 1943 में वरिष्ठ प्रचारक ठाकुर राम सिंह जी के प्रयासों से जिला कांगड़ा में 16 शाखाएं आरंभ हुईं। हिमाचल प्रदेश की विषम भौगोलिक परिस्थितियों में संघ के प्रचारकों ने मौन तपस्वियों की भांति कार्य करते हुए संगठन को गति प्रदान की। दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों, सीमित यातायात सुविधाओं और दूर-दराज बसे गांवों तक पहुंचने जैसी चुनौतियों के बावजूद विभिन्न स्थानों पर शाखाएं शुरू हुईं और धीरे-धीरे उनका विस्तार होता गया। प्रदेश में भी विद्या भारती, एकल विद्यालय, सेवा भारती जैसे संगठन सक्रिय रूप से अपनी भूमिका निभा रहे हैं। शिक्षा, सेवा और समाज के जरूरतमंद वर्गों की सहायता के माध्यम से ये संगठन विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्ष की यात्रा को व्यक्ति निर्माण से समाज निर्माण तक पहुंचने वाली यात्रा के रूप में देखा जा सकता है। शाखा के माध्यम से व्यक्ति में संस्कार, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति समर्पण का भाव विकसित करने का प्रयास किया गया। आगे चलकर इसी प्रेरणा से विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों में कार्य का विस्तार हुआ। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी शताब्दी यात्रा के दौरान शाखा से समाज तक पहुंचा है। व्यक्ति निर्माण से समाज निर्माण और समाज निर्माण से राष्ट्र निर्माण की यह यात्रा आगे भी निरंतर जारी रहने की अपेक्षा की जाती है।

Dr Avnish Kumar